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ड्रैगनफल की व्यवसायिक खेती करें, देखें खेती करने का पूरा तरीका, लाभ और लागत

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ड्रैगनफल की खेती: ड्रैगनफल (हाइलोसिरस अनडेटस) कैक्टस प्रजाति का उष्णकटिबंधीय फल है। अपने अद्वितीय पौष्टिक और स्वास्थ्यवर्द्धक गुणों के कारण मध्य अमेरिका के इस फल ने भारतीय बाजार में धमाकेदार प्रवेश किया है। इस अनोखे फल की बढ़ती मांग एवं लोकप्रियता के कारण भारतीय किसानों के लिए भी इस विदेशी फल की खेती फायदे का सौदा साबित हो रही है। मध्य अमेरिका से चलकर इजराइल, वियतनाम, ताइवान, निकारागुआ, ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया, थाईलैंड का लंबा सफर करते हुए अब ड्रैगनफल धीरे-धीरे भारत के खेतों में भी दस्तक दे रहा है। देश में अनेक राज्यों के किसान इसकी खेती कर अच्छा खासा मुनाफा कमा रहे हैं। राजस्थान में इस फल की खेती 4-5 वर्षों से की जा रही है। वर्तमान में राजस्थान के किसानों द्वारा उन्नत गुणवत्ता के ड्रैगनफलों का उत्पादन किया जा रहा है। इसको घरेलू खपत के साथ-साथ देश के अन्य राज्यों में भी ऊंची कीमत (200-400 रुपये प्रति कि.ग्रा.) पर बेचा जा रहा है और विदेशों में निर्यात भी किया जा रहा है।

ड्रैगनफल की खेती: ड्रैगनफल का गूदा सफेद और लाल रंगका एवं स्वाद में हल्का मीठा होता है। इसमें असंख्य छोटे-छोटे काले रंग के बीज पाए जाते हैं। इसके ताजे फलों को काटकर इसका गूदा (बीज सहित) चाव से खाया जाता है। ड्रैगनफल से जैम, जेली, आइसक्रीम, कैंडी,चॉकलेट, पेस्ट्री, योगर्ट, शीतल पेय पदार्थ आदि तैयार किए जाते हैं। इसके गूदे को पिज्जा में भी मिलाया जाता है। मलेशिया में ड्रैगनफल की मदिरा लोकप्रिय है। इसके पुष्प, कलियों और फलों से जायकेदार सूप और सलाद तैयार कर पांच सितारा होटलों में परोसा जाता है। ड्रैगनफल का इस्तेमाल चाय बनाने में फ्लेवर के लिए किया जाता है। इसके मांसल तनेके गूदे का इस्तेमाल सौंदर्य प्रसाधन सामग्री बनाने में किया जाता है। इसको सजावटी पौधे के तौर पर भी घरों में लगाया जाता है। यह विटामिन ‘सी’ और आयरन का मुख्य स्रोत भी है। देश-विदेश में प्रकाशित शोध के अनुसार ड्रैगनफल के 100 ग्राम गूदे में जल 87 ग्राम प्रोटीन 1.1 ग्राम, वसा 0.4 ग्राम, कार्बोहाइड्रेट 11 ग्राम, क्रूड फाइबर 3 ग्राम, कैल्शियम 8.५ मि.ग्रा., फॉस्फोरस 22.5 मि.ग्रा., आयरन 1.9 मि.ग्रा., विटामिन बी, (थयमीन) 0.04 मि.ग्रा., विटामिन बी, (राइबोफ्लेविन) 0.05 मि.ग्रा., विटामिन बी, (थियामिन) 0.06 मि.ग्रा. एवं विटामिन ‘सी’ 20.5 मि.ग्रा. के अलावा बहुत से एंटीऑक्सीडेंटस पाए जाते हैं। इसके गूदे का ब्रिक्स मान 11-19 तथा पी-एच 4.7 से 5.1 तक होता है। इतने सारे पौष्टिक तत्वों से भरपूर होने के कारण ड्रैगनफल को स्वर्ग का फल कहा जाता है।

ड्रैगनफल की खेती के लिए जलवायु

 ड्रैगनफल उष्णकटिबंधीय जलवायु के लिए अनुकूल पौधा है। इसकी खेती समुद्र तल से 1700 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में आसानी से की जा सकती है। ड्रैगनफल पौधे मौसम परिवर्तन और तापमान के उतार-चढ़ाव को आसानी से सहन कर लेते हैं। इसकी खेती 500-1500 मि.मी. वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में आसानी से की जा सकती है। इसके पौधे 40 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान भी सहन कर लेते हैं। अधिक ठण्ड में पौधों की वृद्धि और विकास अवरूद्ध हो जाता है। फलों के विकास एवं पकने के समय गर्म एवं शुष्क जलवायु की आवश्यकता होती है।

ड्रैगनफल की खेती में पौधों का प्रवर्द्धन

ड्रैगनफल का प्रवर्द्धन बीज और वानस्पतिक विधि द्वारा किया जा सकता है। बीज द्वारा पौधे देर में तैयार होते है तथा बीजू पौधे धीमी गति से बढ़ते हैं और उत्पादनभी 3-4 वर्ष में प्राप्त होता है। इसलिएव्यावसायिक खेती के लिए वानस्पतिक र प्रवर्द्धन (तनों/टहनियों की कलम) ही सबसे । सरल और उत्तम विधि है। इस विधि से जू लगाए गए पौधों में दूसरे वर्ष में फलन प्रारंभ हो जाता है। वर्षभर कभी भी कटिंग/पौध तैयार की जा सकती है। पौधों में फल तोडने के बाद ही सुबह के समय कलम काटना उचित रहता है। रोपण के लिए 15-60 सें.मी. की कलमें (शाखाएं/टहनियां) अच्छी मानी जाती हैं। 

ड्रैगनफल की खेती के लिए पौधशाला की तैयारी

मानसून आगमन से पूर्व मुख्य खेत के पास पौधशाला तैयार कर कलम रोपण का कार्य संपन्न कर लेना चाहिए। कलमों से त्वरित जडों के प्रस्फुटन के लिए जड़ों के कटे हुए सिरों को पानी से गीला करने के बाद उन्हें पादप हार्मोन जैसे-आईबीए 10 ग्राम प्रति लीटर जल में 10 सेकेंड तक डुबोना चाहिए। सामान्य रूप से कलमों में जड़ विकसित होने में 40-50 दिनों का समय लगता है। इसके लिए 10×10 मीटर की पौधशाला में 1100 पौधे तैयार किए जा सकते हैं। 

ड्रैगनफल की खेती पौध रोपण का तरीका

ड्रैगनफल के पौधे आरोही बेल प्रकृति के होते हैं। इसलिए इनके बढ़ने-चढ़ने के लिए 3×3 मीटर (पंक्ति से पंक्ति एवं पोल से पोल) की दूरी पर सीमेंट कंक्रीट के पोल (100-150 मि.मी. व्यास के 2 मीटर लंबे) लगाए जाते हैं। प्रत्येक पोल के ऊपर 2.5 फीट व्यास की रिंग (अथवा कंक्रीट का चौकोर ढांचा) लगाई जाती है, जिसमें चारों ओर एक-एक छेद होना चाहिए। वर्षा आगमन से पूर्व मुख्य खेत में 3×3 मीटर (पंक्ति से पंक्ति X पोल से पोल) की दूरी पर 60 सें.मी. गहरा एवं 60 सें.मी. चौड़ा गड्ढा खोदकर छोड़ देना चाहिए। वर्षा प्रारंभ होने के बाद जून-जुलाई में प्रत्येक पोल । के चारों तरफ 4 पौधे रोपने चाहिए। मृदा बालू और गोबर की खाद का 1:1:2 के अनुपात में मिश्रण बनाकर उसमें 100 ग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट मिलाकर गड्ढों में भरते हुए पौध रोपण का कार्य सम्पन्न करें। गोबर की खाद या वर्मीकम्पोस्ट की मात्रा 8-10 कि.ग्रा. प्रति गड्ढा रखनी चाहिए। खेत में 3-3 मीटर की दूरी पर गड्ढे करने से एक एकड़ जमीन में 449 पोल स्थापित होंगे तथा प्रति पोल 4 पौधे लगाने में प्रति एकड़ 1776 पौधे लगाने चाहिए। सामान्य तौर पर ड्रैगनफल के पौधे जून-जुलाई अथवा फरवरी-मार्च में रोपे जाने चाहिए। अधिक वर्षा या अधिक सर्दी वाले क्षेत्रों में इसे सितंबर अथवा फरवरी-मार्च में लगाया जा सकता है।

पौधों की देखभालcccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC1ड्रैगनफल के पौधे एक वर्ष में ही फल देने के लायक हो जाते हैं। अनुकूल परिस्थितियों में इसके पौधों में मई-जून में फूल लगते हैं और अगस्त से दिसंबर तक फल आते रहते हैं। यह एक पर-परागित फसल है। इसके फलों में परागण की क्रिया तितलियों, मधुमक्खियों आदि द्वारा संपन्न होती है। यह कार्य सुबह के समय हाथ से भी किया जा सकता है। कुछ पुष्पों को खोलकर उनमें से फलालेन के कपड़े में परागकण एकत्रित कर अन्य पुष्पों पर फैला देने से फलों का विकास अधिक होता है। आमतौर पर 40 से 45 दिनों में पुष्पों से फल तैयार हो जाते हैं। एक ऋतु में इसके पौधों में प्रायः 3-4 बार फलन होता है। कच्चे फलों का रंग गहरा हरा तथा पकने पर फलों का रंग गुलाबी लाल हो जाता है। फलों का रंग 70 प्रतिशत लाल-गुलाबी या पीला हो जाने पर तुडाई कर लेनी चाहिए।

ड्रैगनफल की खेती में खाद व उर्वरक

जैविक खाद की मात्रा प्रति दो वर्ष में बढ़ाते रहना चाहिए। पौधों के समुचित विकास और उत्तम फलन के लिए समय-समय पर रासायनिक खाद भी देनी चाहिए। रोपण के समय जैविक खाद के साथ म्यूरेट ऑफ पोटाश+सिंगल सुपर फॉस्फेट+यूरिया को क्रमश: 30:70:50 ग्राम प्रति पौधा देना चाहिए। फूल आने से पहले और फल आने के समय प्रति पौधा 40 ग्राम यूरिया, 40 ग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट और 80 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश देना चाहिए। तीसरे वर्ष से 300:500 :600 ग्राम क्रमशः यूरिया, सिंगल सुपर फॉस्फेट और म्यूरेट ऑफ पोटाश प्रति पौधा प्रतिवर्ष देना चाहिए। 

उपज व लाभ का विश्लेषण

शुरुआती दौर में ड्रैगनफल के एक पौधे पर 10-12 तक फल लगते हैं। बाद में इसकी संख्या धीरे-धीरे बढ़ जाती है। एक पोल पर 40 से 100 फल तक लग सकते हैं। एक फल का औसत वजन 200-300 ग्राम संभावित है। एक एकड़ में अनुमानित 449 पोल स्थापित किए जाते हैं। प्रथम वर्ष में एक पोल से यदि 40 फल भी प्राप्त होते हैं, तो 200 ग्राम प्रति फल भार की दर से कुल 3592 कि.ग्रा. फल प्रति एकड़ प्राप्त हो सकते हैं। बाजार भाव कम से कम 125 रुपये प्रति कि.ग्रा. मान लिया जाए, तो प्रथम वर्ष 4,49,000 रुपये की कमाई होती है। इसमें से तीन लाख की उत्पादन लागत घटाकर 1 लाख 49 हजार रुपये प्रति एकड़ का शुद्ध मुनाफा प्राप्त हो सकता है।

ड्रैगनफल की खेती में लाभ और लागत

पहले वर्ष में ड्रैगनफल केवल 8 से 10 क्विंटल या 800-1000 कि.ग्रा. प्रति एकड़ उपज दे सकता है। 1 कि.ग्रा. ड्रैगनफल का थोक मूल्य लगभग 150 रुपये प्रति कि.ग्रा. रहता है, इसलिए 1000 कि.ग्रा. ड्रैगनफल बेचकर डेढ़ लाख तक की कमाई की जा सकती है। पहले वर्ष में इसकी पैदावार कम रहती है, लेकिन इसके बाद ड्रैगनफल की खेती में 75 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है। एक एकड़ में इसका उत्पादन 4 से 6 टन तक जा सकता है।

सारणी 1 ड्रैगनफल के लाभ का आंकलन

वर्ष पैदावार(रुपये)आय(रुपये)
पहला वर्ष  800-1000120000-150000
 दूसरा वर्ष 3000-5000 450000-750000 
तीसरा वर्ष4000-6000 60000-90000
चौथा वर्ष4000-6000  60000-90000 
पांचवां वर्ष4000-6000 60000-90000
छठावां वर्ष5000-70007000-80000
सातवां वर्ष 1500-2000 225000-300000
कुल आय रुपये 30,45,000-46,50,000

स्त्राेत : फल-फूल पत्रिका(आईसीएआर) मोती लाल मीणा एवं धीरज सिंह भाकृअनुप-काजरी, कृषि विज्ञान केन्द्र, पाली-मारवाड़- 306401 (राजस्थान)

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