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बाजरे की खेती : तकनिकी रूप से बाजरे की उन्नत खेती करे और बढ़ाये अपनी आय

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बाजरे की उन्नत खेती

  • बाजरा एक ऐसी फसल है ऐसे किसानो जो कि विपरीत परिस्थितियो एवं सीमित वर्षा वाले क्षेत्रो तथा बहुत कम उर्वरको की मात्रा के साथ, जहाँ अन्य फसले अच्छा उत्पादन नही दे पाती के लिए संतुत की जाती है।
  • बाजरा की फसल जो गरीबो का मुख्य श्रोत है- उर्जा, प्रोट्रीन विटामिन, एवं मिनरल का ।
  • बाजरा शुष्क एवं अर्द्धषुष्क क्षेत्रो मे मुख्य रुप से उगायी जाती है, यह इन क्षेत्रो के लिए दाने एवं चारे का मुख्य श्रोत माना जाता है। सूखा सहनषील एवं कम अवधि (मुख्यतः 2-3 माह) की फसल है जो कि लगभग सभी प्रकार की भूमियो मे उगाया जा सकता है। बाजरा क्षेत्र एवं उत्पादन मे एक महत्वपूर्ण फसल है ।जहाँ पर 500-600 मि.मी. वर्षा प्रति वर्ष होती है जो कि देश के शुष्क पष्चिम एवं उत्तरी क्षेत्रो के लिए उपयुक्त रहता है
  • न्यूटिषियन जरनल के अध्ययन के अनुसार भारत वर्ष के 3 साल तक के बच्चे यदि 100 ग्राम बाजरा के आटे का सेवन करते है तो वह अपनी प्रतिदिन की आयरन (लौह) की आवष्यकता की पूर्ति कर सकते है तथा जो 2 साल के बच्चे इसमे कम मात्रा का सेवन करे ।
  • बाजरा का आटा विशेषकर भारतीय महिलाओ के लिए खून की कमी को पूरा करने का एक सुलभ साधन है। भारतवर्ष मे ही नही अपितु संसार मे महिलाये एवं बच्चे मे लौहतत्व (आयरन) एवं मिनरल(खनिज लवण) की कमी पायी जाती है – डा. एरिक बोई, विभागाध्यक्ष न्यूटिषियन हारवेस्टप्लस के अनुसार गेहूँ एवं चावल से, बाजरा आयरन एवं जिंक का एक बेहतर श्रोत है
  • बाजरा की खेती मध्यप्रदेष मे लगभग 2 लाख हे. भूमि मे की जाती है जो मुख्य रुप से मध्यप्रदेष के उत्तरी भाग भिण्ड, मुरैना, श्योपुर तथा ग्वालियर जिले मे उगायी जाती है। भिण्ड जिले मे बाजरा लगभग 45000 हेक्टेयर भूमि पर उगाया जाता है।
  • बाजरा के दानो मे, ज्वार से अच्छी गुणवत्ता के पोषक तत्व पाये जाते है। दानो मे 12.4 प्रतिशत नमी, 11.6 प्रतिषत प्रोटीन, 5 प्रतिषत वसा, 76 प्रतिशत कार्बोहाईड्रेटस तथा 2.7 प्रतिशत मिनरल पाये जाते हैं।
  • बाजरा के दानो को चावल की तरह पकाकर या चपाती बनाकर प्रयोग कर सकते है इसको मुर्गियो के आहार पशुओ के लिए हरे चारे तथा सूखे चारे के लिये भी उपयोग मे लाया जाता है।

जलवायु

  • बाजरा की फसल तेजी से बढने वाली गर्म जलवायु की फसल है जो कि 40-75 सेमी. वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रो के लिए उपयुक्त होती है। इसमे सूखा सहन करने की अदभुत शक्ति होती है।
  • फसल वृद्धि के समय नम वातावरण अनुकूल रहता है साथ ही फूल अवस्था पर वर्षा का होना इसके लिए हानिकारक होता है क्योंकि वर्षा से परागकरण घुल जाने से वालियो मे कम दाने बनते है। साधारणतः बाजरा को उन क्षेत्र मे उगाया जाता है जहाँ ज्वार को अधिक तापमान एवं कम वर्षा के कारण उगाना संभव न हो।
  • ाजरा की अच्छी बढवार के लिए 20-280 सेन्टीग्रेट तापमान उपयुक्त रहता है

भूमि-

बाजरा को कई प्रकार की भूमियो काली मिट्टी,दोमट, एवं लाल मृदाओ मे सफलता से उगाया जा सकता है लेकिन पानी भरने की समस्या के लिए बहुत ही सहनशील है।

उन्नत किस्मे

हाईब्रिड

क्र.किस्मअधिसूचना वर्षकेन्द्र का नामअनुकूल क्षेत्रविशेष गुण,
1के.वी.एच. 108 (एम.एच. 1737)2014कृष्णा सीड़ प्रा.लि. आगराम.प्र.,उ.प्र., पंजाब, दिल्ली, हरियाणा,गुजरात, राजस्थान,देर से पकने के लिए, बडे पौधे, डाउनीमिल्ड्यू, ब्लास्ट एवं स्मट प्रतिरोधी
2जी.वी.एच. 905 (एम.एच. 1055)2013ए.आई.सी.पी.एम.आई.पी.एम.आर.एस. जामनगरम.प्र.,उ.प्र., पंजाब, दिल्ली, हरियाणा,गुजरात, राजस्थान,मध्यम अवधि, मध्यम उचाई, डाउनीमिल्ड्यू प्रतिरोधी
386 एम 89 (एम एच 1747)2013पायोनीयर ओवरसीज को. हैदराबादम.प्र.,उ.प्र., पंजाब, दिल्ली, हरियाणा,गुजरात, राजस्थान,देर से पकने वाली, बडे पौधे, डाउनीमिल्ड्यू प्रतिरोधी
4एम.पी.एम.एच 17(एम.एच.1663)2013ए.आई.सी.पी.एम.आई.पी. जोधपुरम.प्र.,उ.प्र., पंजाब, दिल्ली, हरियाणा,गुजरात, राजस्थान,मध्यम अवधि एवं उचाई, डाउनीमिल्डयू सहिष्णुता
5कवेरी सुपर वोस (एम.एच.1553)2012कावेरी सीड को.लि. सिकन्दराबादम.प्र.,उ.प्र., पंजाब, हरियाणा,गुजरात, राजस्थान,देर से पकने वाली, बडे पौधे
686 एम. 86 (एम. एच. 1684)2012पायोनीयर ओवरसीज को. हैदराबादम.प्र.,उ.प्र., पंजाब, हरियाणा,गुजरात, राजस्थान,देर से पकने वाली, मध्यम उचाई
786 एम. 86 (एम. एच. 1617)2011ए.आई.सी.पी.एम.आई.पी.टी.एन.ए.यू.कोयम्बटूरम.प्र. गुजरात, हरियाणा, राज. उ.प्र. दिल्ली, पंजाबदेर से पकने वाली, मध्यम उचाई, डाउनीमिल्ड्यू प्रतिरोधी
8आर.एच.बी. 173(एम.एच. 1446)2011ए.आई.सी.पी.एम.आई.पी.एस.के.आर.ए.यू.जयपुरम.प्र. गुजरात, हरियाणा, राज. उ.प्र. दिल्ली, पंजाबमध्यम अवधि, मध्यम से बडी उचाई, डाउनीमिल्ड्यू सहिष्ण
9एच.एच.बी. 223(एम.एच. 1468)2010ए.आईसी.पी.एम. आई.पी.सी.एस.एच.ए.यू. हिसारम.प्र. गुजरात, हरियाणा, राज. उ.प्र. दिल्ली, पंजाबमध्यम अवधि, डाउनीमिल्डयू प्रतिरोधी, सूखा सहिष्णु
10एम.वी.एच. 1301986महिको जालनासम्पूर्ण भारत80-85 दिन अवधि, मध्यम उचाई
प्रजातियाँ (अनाज एंव चारे के लिऐ )
1जे.सी.बी. 4(एम.पी. 403)2007ए.आई.सी.पी.एम.आई.पीसी.ओ.ए.,ग्वालियरम.प्र.अवधि 75 दिन, मध्यम उचाई
2सी.जेड.पी. 98022003कजरी, जोधपुरसूखाग्रस्त क्षेत्र- राज.,गुजरात, हरियाणा70-72 दिन, मध्यम उचाई, सूखा सहिष्णुता अधिक कडवी, हाईब्रिड
3जवाहर बाजरा -32002जवाहरलाल नेहरु कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुरम.प्र.उपज 18-20 क्वि./हे., अवधि 75-80 दिन डाउनीमिल्ड्यू प्रतिरोधी
4जवाहर बाजरा -42002जवाहरलाल नेहरु कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुरम.प्र.उपज 15-27 क्वि./हे., अवधि 75-80 दिन डाउनीमिल्ड्यू प्रतिरोधी
5देशी(क्षेत्रीय किस्म)विशेष रुप से हरे चारे के लिएउपज 12-15 क्वि./हे., सूखी कडवी 125-150 क्विंटल/हेक्टेयर

खेत की तैयारी-

बाजरा का बीज बारीक होन के कारण खेत को अच्छी तरह से तैयार करना चाहिए। एक गहरी जुताई के बाद 2-3 बार हल से जुताई कर खेत को समतल करना चाहिए, जिससे खेत मे पानी न रुक सके, साथ मे पानी के निकास की उचित व्यवस्था की जानी चाहिए। बुवाई के 15 दिन पूर्व 10-15 टन प्रति हेक्टेयर सडी गोबर की खाद डालकर हल द्वारा उसे भलीभॉती मिट्टी मे मिला देते हैं। दीमक के प्रकोप की संभावना होने पर प्रति 25 कि.ग्रा./हेक्टेयर क्लोरोपायरीफॉस 1.5 प्रतिषत चूर्ण खेत मे मिलाये।

बुवाई का समय एवं विधि-

वर्षा प्रारंभ होते ही जुलाई के दूसरे सप्ताह तक इसे कतारो मे बीज को 2-3 सेमी. गहराई पर बोना चाहिए। लाइन से लाइन 45 से.मी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 10 -15 सेमी. उपयुक्त होती है।

फसल चक्र-

  • बाजरा-जौ बाजरा-गेहूँ
  • बाजरा-चना बाजरा-मटर
  • बाजरा-सरसों आदि ।

अन्र्तवर्तीय फसलें –

अन्तवर्तीय फसले जैसे बाजरा की दो पंक्तियों के बीच में दो पंक्ति उडद/ मूंग की लगाने से उडद/मूंग की लगभग 3 क्विंटल/हेक्टेयर तक अतिरिक्त उपज मिलती है।
बाजरा की दो पंक्तियो के बीच मे 2 पक्ति लोबिया की लगाने से इससे 45 दिन के अंदर 80-90 क्विंटल/हेक्टेयर तक अतिरिक्त हरा चारा मिल जाता है।

पौधे रोपण़-

बाजरा की समय से बोनी का न हो पाना उसके लिए कई कारण उत्तरदायी हो सकते है – जैसे मानसून का देर से आना, भारी एवं लगातार वर्षा का बोनी के उपयुक्त समय पर हाना अथवा गर्मी की फसल देर से कटाई आदि। इन परिस्थितियो मे बाजरा की पौध रोपण करना ज्यादा उत्पादन देता है बजाय सीधी बीज बुवाई के। पौध रोपण के निम्न लाभ होते है-

  • पौध रोपण से फसल शीध्र पक जाती है तथा देरी से कम तापमान का प्रभाव दाने बनने पर नही पडता।2 अच्छी वृद्धि के कारण अधिक कल्ले एवं वाली निकलती है।
  • पौधे की संतुत संख्या रख सकते है।
  • रोपे हुए पौधे अच्छी वृद्धि करते है क्योंकि लगभग तीन सप्ताह पुराने पौधे लगातार वर्षा स्थिति को अच्छी तरह से सहन कर सकते है।
  • डाउनीमिल्डयू से प्रभावित पौधे को लगाने के समय उनको निकाला जा सकता है।आरम्भ होने के बाद दो- तीन बार हल या बखर चलाकर खेत को समतल करे । वर्षा आरम्भ होने के पहले बोनी करने से पौधो की बढ़वार अच्छी होती है।

पौधरोपण के लिए नर्सरी तैयार करना-

एक हेक्टेयर भूमि के लिए 2 कि.ग्रा. बाजरा को 500-600 वर्ग मी. क्षेत्रफल मे बोना चाहिए। बीज को 1.2 मी.X 7.50 मी (चैडाई X लम्बाई) क्यारियों मे 10 सेमी. दूरी एवं 1.5 सेमी.की गहराई पर बोना चाहिए। पौधे की अच्छी बढवार के लिए नर्सरी मे 25-30 कि.ग्रा. कैल्सियम अमेनियम नाईटेªट का प्रयोग करते है। नर्सरी से पौधो को तीन सप्ताह बाद उखाडकर खेत मे रोपण कर देना चाहिए। साथ ही पौधे को उखाडते समय नर्सरी की क्यारियाँ गीली होनी चाहिए जिससे पौधो को उखाडते समय उनकी जडे प्रभावित न होने पायें। पौधे को उखाडने के बाद बढवार बिन्दू से ऊपर के भाग का तोड़ देते है जिससे कम से कम ट्रांसपाइरेषन (वाष्पोत्सर्जन) हो सके। साथ ही साथ रोपण उस दिन करना चाहिए जिस दिन वर्षा हो रही हो। यदि वर्षा नही हो रही तो खेत मे सिचांई कर देना चाहिए जिससे पौध आसानी से रोपित हो सकें। एक छेद मे एक पौधे को 50 सेमी. की दूरी तथा पौधे से पौधे की दूरी 10 सेमी. दूरी रखते है। जुलाई के तीसरे सप्ताह से लेकर अगस्त के दूसरे सप्ताह तक कर देनी चाहिए।

उर्वरक-

बुवाई के पहले 40 कि.ग्रा. नत्रजन, 40 कि.ग्रा. स्फुर तथा 20 कि.ग्रा. पोटाष प्रति हेक्टेयर देना चाहिए। बोेने के लगभग 30 दिन पर शेष 40 कि.ग्रा. नत्रजन प्रति हेक्टेयर देनी चाहिए। उर्वरकों की आधार मात्रा सदैव बीज के नीचे 4-5 सेमी. गहराई पर बोते हैं।

समन्वित खरपतवार नियंत्रण-

खेत मे जहा पर अधिक पौधो उगे हो उन्हे वर्षा वाले दिन निकालकर उन स्थानो पर लगाये जिस स्थान पर पौधो की संख्या कम हो। यह कार्य बीज जमने के लगभग 15 दिन पर कर देना चाहिए । बोनी के 20 – 25 दिन पर एक बार निदाई कर देनी चाहिए। चैडी पत्ती के खरपतवारों के नियंत्रण हेतु बोनी के 25-30 दिन पर 2,4 डी 500 ग्राम मात्रा 400-500 ली. पानी मे घोल बनाकर छिडकाव करे । सकरी एवं चैडी पत्ती के खरपतवारो के नियंत्रण के लिए बोनी के तुरंत बाद एट्राजीन 1 किलोग्राम सक्रिय तत्व प्रति हेक्टे. 400-500 लीटर पानी मे मिलाकर छिडकाव करना चाहिए।

सिंचाई-

बाजरा एक वर्षाधारित फसल है इसलिये इसको पानी सिचांई की कम ही आवष्यकता होती है जब वर्षा न हो तब फसल की सिंचाई करनी चाहिए। साधारणतः फसल को सिंचाइयो की इसकी बढवार के समय आवष्यकता होती है। यदि वाली निकलते समय कम नमी है तो इस समय सिंचाई की आवष्कता पडती है क्योंकि उस स्तर पर नमी की बहुत आवष्कता होती है। बाजरा की फसल अधिक देर तक पानी भराव को सहन नही कर सकती इसलियें पानी के निकास का उचित प्रबंध करना चाहिए।

समन्वित कीट एवं रोग प्रबंधन-

समय से बुवाई करने पर कीट संख्या कम हो जाती है, प्रकास प्रपंच का प्रयोग कीटो की निगरानी हेतु करना, ब्हाइट ग्रब बीटल को यांत्रिक विधि से एकत्रित कर नष्ट करना।

कीट एवं बीमारियाँनियंत्रण के उपाय
तना छेदक, ब्लिस्टर बीटल, ईयरहेड, केटर पिलरप्रारंभिक अवस्था मे कीट प्रभावित पौधो को उखाड कर नष्ट कर देना चाहिएNSKE (नीमषत)/ 5 % का छिडकाव कम से कम 2 बार करना जिससे कीटो की संख्याकम हो सके। निमोटोड नियंत्रण हेतु नीमखली / 200 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर प्रयोग करे।तनाछेदक मक्खी (Shootfly ) के अधिक प्रकोप होने पर इसके नियंत्रण हेतु कार्बोफ्यूरॉन3 जी. / 8-10 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर अथवा मोनोकोटोफॉस 30 एस.एल.की 750 एम.एल. मात्रा600 लीटर पानी मे मिलाकर छिडकाव करें।
मृदुरोमिल आसित (हरित वाली या डाउनीमिल्ड्यू)निरोधक प्रजाति – जे.वी.-3, जे.वी. 4 प्रजाति अपनायें,बीजो को फफूदनाषक दवा एप्राॅन 35 एस.डी. 6 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज से उपचारित करबोनी करे।प्रभावित पौधो को देखकर उखाडना,30 दिन फसल अवधि पर 0.2 प्रतिषत मैनकोजैब का छिडकाव डाउनीमिल्ड्यू नियंत्रण हेतु याथीरम0.2 प्रतिषत का छिडकाव 3 बार 50 प्रतिषत फूल बनने पर करे।
कड़वा रोगजे.बी.एच.-2, जे. बी.एच.-3 एवं आई.सी.एम.बी. – 221 प्रजातियो मे रोग का प्रभाव कम होताहै।
बाजरा का कंडवा – रोगबाजरा का हरित वाली रोग (डाउनीमिल्ड्यू) – बाजरा का अर्गट रोग

कटाई एवं भण्डारण-

फसल पूर्ण रुप से पकने पर कटाई करे फसल के ढेर को खेत मे खडा रखे तथा गहाई के बाद बीज की ओसाई करे। दानो को धूप मे अच्छी तरह सुखाकर भण्डारित करे।

उपज-

  • वैज्ञानिक तरीके से सिंचित अवस्था मे खेती करने पर प्रजातियो से 30 -35 क्विटल दाना
  • हाईब्रिड प्रजातिया लगाने तथा वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन मे 40-45 क्विटल तक उपज प्राप्त होती है।
  • वर्षाधारित खेती मे 12-15 क्विटंल तक दाना तथा 70 क्विटल तक सूखी कडवीं प्राप्त होती है।

औसत आय – व्यय प्रति हेक्टेयर का आंकलन –

आय- औसत दाना 40 क्विंटल / 1250 प्रति क्विंटल =50000/- + कडवी- 5000/- प्रति हेक्टेयर
कुल आय =55000 /-
कुल लागत =30000/-
शुद्ध आय =25000/-

source by – mpkrishi

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