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लाल कद्दू बीटल और फल मक्खी से खराब हो सकती है तरबूज की फसल, समय रहते करें ये काम।

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तरबूज गर्मी के मौसम की एक प्रमुख नकदी फसल मानी जाती है, जिसकी मांग बाजार में लगातार बनी रहती है। अच्छी पैदावार और बेहतर गुणवत्ता के लिए फसल को कीट एवं रोगों से बचाना बेहद जरूरी होता है। तरबूज की खेती के लिए 25 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त माना जाता है। इसकी खेती बलुई दोमट मिट्टी में अच्छी होती है, जहां मिट्टी का pH मान 6.0 से 7.5 के बीच हो। किसान जनवरी से मार्च के बीच इसकी बुवाई कर सकते हैं। प्रति हेक्टेयर लगभग 2 से 3 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है।

लाल कद्दू बीटल, एफिड्स और फल मक्खी से ऐसे बचाएं फसल

तरबूज की फसल में लाल कद्दू बीटल, एफिड्स और फल मक्खी जैसे कीट सबसे अधिक नुकसान पहुंचाते हैं। ये कीट पत्तियों, फूलों और फलों को खराब कर देते हैं, जिससे उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है। लाल कद्दू बीटल पत्तियों को खाकर पौधों की बढ़वार रोक देता है, जबकि एफिड्स रस चूसकर पौधों को कमजोर बना देते हैं। फल मक्खी फलों में अंडे देकर उन्हें अंदर से सड़ा देती है। इनकी रोकथाम के लिए खेत की नियमित निगरानी जरूरी है। किसान पीले चिपचिपे ट्रैप, जैविक कीटनाशकों और आवश्यकता अनुसार संतुलित रासायनिक दवाओं का उपयोग कर सकते हैं।

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डाउनी मिल्ड्यू और पाउडरी मिल्ड्यू रोग से करें बचाव

तरबूज की फसल में डाउनी मिल्ड्यू और पाउडरी मिल्ड्यू प्रमुख रोग माने जाते हैं। इन रोगों के कारण पत्तियों पर सफेद या पीले धब्बे बनने लगते हैं, जिससे पौधों की प्रकाश संश्लेषण क्षमता कम हो जाती है और फल का विकास प्रभावित होता है। इन रोगों से बचने के लिए रोग प्रतिरोधी किस्मों का चयन करना चाहिए। साथ ही फसल चक्र अपनाने, खेत में जल निकासी की उचित व्यवस्था रखने और समय पर फफूंदनाशकों का छिड़काव करने से रोग नियंत्रण में मदद मिलती है। खेत में अधिक नमी और लगातार पानी भराव की स्थिति से भी बचना चाहिए।

सिंचाई, उर्वरक प्रबंधन और उत्पादन की जानकारी

तरबूज की अच्छी पैदावार के लिए संतुलित उर्वरक प्रबंधन और सही सिंचाई बेहद जरूरी होती है। फसल को लगभग 330 से 350 मिमी पानी की आवश्यकता पड़ती है। ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग तकनीक अपनाने से पानी की बचत होती है और उत्पादन में बढ़ोतरी होती है। समय पर पोषक तत्व देने से फल का आकार और मिठास भी बेहतर होती है। सामान्य तौर पर तरबूज की फसल 75 से 90 दिनों में तैयार हो जाती है और किसान प्रति हेक्टेयर लगभग 250 से 350 क्विंटल तक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।

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