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पान की उन्नत खेती कर बड़ाए अपनी आय किसान करे पान की तकनीकी खेती देखे कैसे

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पान की खेती

पान की खेती लता (बेल) पौधों के रूप में की जाती है | इसके पौधों में निकलने वाली बेल कई वर्षो तक पैदावार दे देती है | पान का इस्तेमाल शौकिया तौरपर खाने के लिए किया जाता है, इसके आलावा पान को हिन्दू धर्म में पूजा- पाठ और हवन के कार्यो में मुख्य रूप से इस्तेमाल में लाया जाता है | पान के पत्ते को कत्था, चूना, शहद और सुपारी लगाकर खाया जाता है| पान से निकली लार से पाचन शक्ति मजबूत होती है, और शरीर भी स्वस्थ रहता है

इसके आलावा कई बीमारियों में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है, तथा शरीर में लगे घाव व फोड़े में पान के पत्तो को पीसकर लगाने से जल्द आराम मिल जाता है | व्यापारिक रूप से इसके पत्तो का इस्तेमाल धूम्रपान की चीजों को बनाने के लिए किया जाता है | यदि आप भी पान की खेती करने में रुचि रखते है, तो इस लेख में आपको पान की खेती कैसे होती है (Betel Leaf Cultivation in Hindi) तथा पान की उन्नत किस्में के बारे में जानकारी दी जा रही है

भारत में पान की खेती

भारत वर्ष में पान की खेती प्राचीन काल से ही की जाती है। अलग-अलग क्षेत्रों में इसे अलग- अलग नामों से पुकारा जाता है। इसे संस्कृत में नागबल्ली, ताम्बूल हिन्दी भाषी क्षेत्रों में पान मराठी में पान/नागुरबेली, गुजराती में पान/नागुरबेली तमिल में बेटटीलई,तेलगू में तमलपाकु, किल्ली, कन्नड़ में विलयादेली और मलयालम में बेटीलई नाम से पुकारा जाता है। देश में पान की खेती करने वाले राज्यों में प्रमुख राज्य निम्न है।

राज्यअनुमानित क्षेत्रफल है0 में
कर्नाटक8,957
तमिलनाडु5,625
उड़ीसा5,240
केरल3,805
बिहार4,200
पश्चिम बंगाल3,625
असम (पूर्वोत्तर राज्य)3,480
आन्ध्रप्रदेश3,250
महाराष्ट्र2,950
उत्तर प्रदेश2,750
मध्य प्रदेश1,400
गुजरात250
राजस्थान150

पान के औषधीय गुण

पान अपने औषधीय गुणों के कारण पौराणिक काल से ही प्रयुक्त होता रहा है। आयुर्वेद के ग्रन्थ सुश्रुत संहिता के अनुसार पान गले की खरास एवं खिचखिच को मिटाता है। यह मुंह के दुर्गन्ध को दूर कर पाचन शक्ति को बढ़ाता है, जबकि कुचली ताजी पत्तियों का लेप कटे-फटे व घाव के सड़न को रोकता है। अजीर्ण एवं अरूचि के लिये प्रायः खाने के पूर्व पान के पत्ते का प्रयोग काली मिर्च के साथ तथा सूखे कफ को निकालने के लिये पान के पत्ते का उपयोग नमक व अजवायन के साथ सोने के पूर्व मुख में रखने व प्रयोग करने पर लाभ मिलता है।

वानस्पतिक विवरण/विन्यास

पान एक लताबर्गीय पौधा है, जिसकी जड़ें छोटी कम और अल्प शाखित होती है। जबकि तना लम्बे पोर, चोडी पत्तियों वाले पतले और शाखा बिहीन होते हैं। इसकी पत्तियों में क्लोरोप्लास्ट की मात्रा अधिक होती है। पान के हरे तने के चारों तरफ 5-8 सेमी0 लम्बी,6-12 सेमी0 छोटी लसदार जडें निकलती है, जो बेल को चढाने में सहायक होती है।

आकार में पान के पत्ते लम्बे, चौड़े व अण्डाकार होते हैं, जबकि स्वाद में पान चबाने पर तीखा, सुगंधित व मीठापन लिये होता है।

पान का रसायन

पान में मुख्य रूप से निम्न कार्बनिक तत्व पाये जाते हैं, इसमें प्रमुख निम्न हैः-

फास्फोरस0.130.61%
पौटेशि‍यम1.836%
कैल्शियम0.581.3%
मैग्नीशियम0.550.75%
कॉपर20-27 पी0पी0एम0
जिंक30-35 पी0पी0एम0
शर्करा0.31-40 /ग्रा0
कीनौलिक यौगिक6.2-25.3 /ग्रा0

अन्य गुण

पान में गंध व स्वाद वाले उड़नशील तत्व पाये जाते हैं, जो तैलीय गुण के होते हैं। ये तत्व ग्लोब्यूल के रूप में पान के “मीजोफिल” उत्तकों में पाये जाते हैं। जिनका विशेष कार्य पान के पत्तियों में वाष्पोत्सर्जन को रोकना तथा फफूंद संक्रमण से पत्तियों को बचाना है। अलग-अलग  में ये गंध व स्वाद वाले तत्व निम्न अनुपात में पाये जाते हैं। जैसे- मीठा पान में 85 प्रतिशत सौंफ जैसी गंध, कपूरी पान में 0.10 प्रतिशत कपूर जैसी गंध, बंगला पान में 0.15-.20 प्रतिशत लवंग जैसी, देशी पान में 0.12 प्रतिशत लबंग जैसी । उल्लेखनीय है कि सभी प्रकार के पान में यूजीनॉल यौगिक पाया जाता है, जिससे पान के पत्तों में अनुपात के अनुसार तीखापन होता है। इसी प्रकार मीठा पान में एथेनॉल अच्छे अनुपात में होता है, जिससे इस प्रकार के पान मीठे पान के रूप में अधिक प्रयुक्त होते हैं।

स्त्रोत- श्रीवास्तव जिला उद्यान अधिकारी, महोबा,पत्र सूचना कार्यालय,नई दिल्ली

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