आलू की तकनीकी नई किस्म की खेती कर किसान कमाए लाखों का मुनाफा

आलू की उन्नत खेती : मानव आहार में प्रयोग की जाने वाली विभिन्न प्रकार की सब्जियों में आलू का प्रमुख स्थान है। इसमें कार्बोहाइड्रेट की प्रचूर मात्रा के साथ साथ खनिज लवण, विटामिन तथा अमीनों अम्ल की मात्रा भी पायी जाती है, जो शरीर की वृद्धि एवं स्वास्थ्य के लिये आवश्यक है।

जलवायु आलू के लिये शीतोष्ण जलवायु तथा कंद बनने के समय 18 से 20 डिग्री सेन्टीग्रेड तापक्रम होना चाहिये। यह फसल पाले से प्रभावित होती है।

भूमि आलू की फसल सामान्य तौर पर सभी प्रकार की भूति में उगाई जा सकती है तथा हल्की बलुई दोमट मिट्टी वाला उपजाऊ खेत जहां जल निकास की सुविधा हो इसके लिये विशेष उपयुक्त रहता है। खेत का समतल होना भी आलु की फसल के लिये आवश्यक होता है आलू को 6 से 8 पी एच वाली भूमि में भी सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है परन्तु लवणीय व क्षारीय भूमि इस फसल के लिये पूर्णतया अनुपयुक्त रहती है।

उन्नत किस्में कुफरी पुखराज (1998)

यह एक अगेती किस्म है जो 70-90 दिन में पक कर तैयार हो जाती है एवं इसकी औसत उपज 400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। इसके कन्द बड़े अण्डाकार एवं सफेद पीले रंग का गुदा लिए होते है। यह किस्म अगेती झुलसा रोग प्रतिरोधी लेकिन पिछती झुलसा रोग के प्रति मध्यम प्रतिरोधी है।

कुफरी सूर्या (2005) यह किस्म मध्यम पकाव अवधि 90-110 दिन की है, जिसकी औसत उपज 250-300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। यह किरम हॉपर बरनिंग तथा अत्यधिक तापमान को सहन कर सकती है।

खेत की तैयारी एवं भूमि उपचार

आलू की खेती के लिये खेत की जुताई बहुत अच्छी तरह होनी चाहिये। एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा फिर दो तीन बार हैरो या देशी हल से जुताई कर मिट्टी को भरमुरी कर लेनी चाहिए। प्रत्येक जुताई के बाद पाटा लगायें जिससे ढेले न रहे। भूमि उपचार के लिये अन्तिम जुताई के समय क्यूनॉलफॉस 1.5

प्रतिशत चूर्ण 25 किलो प्रति हैक्टेयर की दर से भूमि में भली भांति देवे जिससे भूमिगत कीटों से फसल की सुरक्षा होती हो सके।

खाद एवं उर्वरक फसल की बुवाई के एक माह पूर्व 25 से 35 टन प्रति हैक्टेयर गोबर की

खाद खेत में भलि भाति मिला देनी चाहिए। जहां तक संभव हो सके मृदा परीक्षण के आधार पर ही उर्वरकों का प्रयोग करें। सामान्यतौर पर 120 से 150 किलो नत्रजन, 80 से 100 किलोग्राम फास्फोरस एवं 80 से 100 किलोग्राम पोटाश प्रति हैक्टेयर के हिसाब से देना चाहिये। नत्रजन की आधी मात्रा, फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई से पूर्व ऊर कर देनी चाहिए। नत्रजन की शेष आधी मात्रा बुवाई के 30 से 35 दिन बाद मिट्टी चढ़ाने से साथ देखें।

कन्दों की तैयारी भण्डारित आलू को 4 से 5 दिन पूर्व शीतगृह से निकाल कर सामान्य ठन्डे स्थान पर रखना चाहिये। बुवाई से पूर्व इसे 24 से 48 घण्टे तक हवादार, छाया युक्त स्थान में फैलाकर रखें। शीतगृह से लाये गये आलूओं को धूप में न रखें और न ही तुरन्त बुवाई के लिये प्रयोग में लावें, अन्यथा बाहरी तापक्रम की अधिकता की वजह से आलू के सडने का खतरा बना रहता है। जिन कन्दों पर अंकुरित प्रस्फुट न दिखाई दे उन्हें हटा देना चाहियें।

कंदों की मात्रा व उपचार

बुवाई के लिये रोग प्रमाणित स्वस्थ कंद ही उपयोग में लेने चाहिए। सिकुड़े हुए या सूखे कन्दों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिये। कंद कम से कम 2.5 सेन्टीमीटर व्यास के आकार का या 25 से 35 ग्राम के साबूत कंद होने चाहिये। विभिन्न परिस्थितियों में एक हेक्टेयर भूमि में बुवाई के लिये 25 से 30 क्विंटल आलु के कंदी की आवश्यकता होती है। बुवाई से पूर्व कंदों को स्ट्रेप्टोसाइकिल 0.1 प्रतिशत अथवा कार्वेण्डाजिम 0.1 प्रतिशत के घोल से उपचारित करके बुवाई करनी चाहिए।

बुवाई आलू की मुख्य फसल की अक्टूबर के अन्तिम सप्ताह तक बुवाई कर देनी चाहिए। बुवाई के समय मौसम हल्का ठण्डा होना चाहिये। कंदो की मात्रा व बुवाई की दूरी सामान्यत कंदों की किस्म, आकार व भूमि की उर्वरकता पर निर्भर करती है। बुवाई से पूर्व कन्दो को 2 ग्राम थाइरम +1 ग्राम बाविस्टिन प्रति लीटर पानी के घोल में 20 से 30 मिनट तक भिगोंये तथा छाया में सुखाकर बुवाई करें।

आलू बोने के लिये निम्न विधियां अपनायी जाती है:- 1. खेत में 60 सेन्टीमीटर की दूरी पर कतार बनाकर 20 सेन्टीमीटर की

दूरी पर 5-7 सेन्टीमीटर की गहराई पर आलु के कन्द बोये। दो कतारों के बीच में हल चलाकर आलू को दबा देंवे। इस प्रकार बोने से 85

डोलियां बनाने का श्रम व खर्चा बचेगा। 2. पहले खेत में 15 सेन्टीमीटर ऊंची डोलिया बना लेंवे और उसके एक तरफ या बीच में आलू के बीज को 5 से 7 सेन्टीमीटर गहरी बुवाई करनी चाहिए।

सिंचाई

बुवाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करनी चाहिये। आमतौर पर आलू की फसल के लिये 10 से 15 सिंचाईयों की आवश्यकता होती है। इसके बाद 7 से 10 दिन के लिये 10 से 15 सिंचाईयों की आवश्यकता होती है। इसके बाद 7 से 10 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए। जैसे-जैसे फसल पकती जाये सिंचाई का अन्तर बढ़ाते जाये। पकने से 15 दिन पूर्व सिंचाई बन्द कर देवें।

निराई गुड़ाई

कंद की बुवाई के 30 से 35 दिन बाद जब पौधे 8 से 10 से.मी. के हो जावे तो खरपतवार निकाल कर मिट्टी चढ़ा देनी चाहिये। इसके एक माह बाद दुबारा मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए।

कंदो की खुदाई

आलू की फसल में जब पत्तियों एवं तना सूखने लगे तो उस समय पौधे के तने को पत्तियों सहित काट लेते हैं तथा इसकी कुछ दिन बाद खुदाई करते है। इससे कन्दों में मजबूती आ जाती है और अधिक समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। अधिक समय तक मिट्टी में छोड़ा गया आलू गर्मी के कारण सड़ जाता है इसलिए समय रहते खुदाई करके आलू निकाल लेना चाहिए।उपज फसल से प्राप्त की जा सकती है। उपज आलू की फसल से औसतन 200-300 क्विंटल प्रति हैक्टेयरआलू प्राप्त किया जा सकता है।