अंगूर की खेती करने वाले किसानों के लिए एआरआई-516 एक नई और लाभकारी किस्म बनकर उभर रही है। इस किस्म को पुणे के आघारकर अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित किया गया है, जो कम समय में तैयार होकर बेहतर उत्पादन देने के लिए जानी जाती है। खास बात यह है कि यह किस्म फफूंद जनित रोगों के प्रति काफी हद तक सहनशील है, जिससे किसानों का जोखिम कम होता है और मुनाफा बढ़ने की संभावना अधिक रहती है।
बेहतर गुणवत्ता और बाजार में बढ़ती मांग
एआरआई-516 अंगूर के फल न सिर्फ देखने में आकर्षक होते हैं, बल्कि स्वाद में भी काफी बेहतर माने जाते हैं। ये फल रस से भरपूर होते हैं, जिनका उपयोग जूस, जैम और रेड वाइन जैसे उत्पाद बनाने में किया जा सकता है। इसी वजह से बाजार में इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है। किसान इस किस्म को अपनाकर न सिर्फ अच्छी पैदावार ले सकते हैं, बल्कि बेहतर दाम भी हासिल कर सकते हैं।
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110–120 दिनों में तैयार होने वाली उन्नत किस्म
यह संकर (हाइब्रिड) किस्म वर्ष 2020 में विकसित की गई थी, जिसे अमेरिकी काटावाबा और विटिस विनिफेरा किस्मों को मिलाकर तैयार किया गया है। एआरआई-516 लगभग 110 से 120 दिनों में तैयार हो जाती है और इसके गुच्छे घने और बड़े होते हैं। यह बीज रहित किस्म होने के कारण बाजार में और भी ज्यादा पसंद की जाती है, जिससे किसानों को बिक्री में आसानी होती है।
कई राज्यों के लिए उपयुक्त, किसानों की आय बढ़ाने में सहायक
विशेषज्ञों के अनुसार एआरआई-516 किस्म महाराष्ट्र, तेलंगाना, तमिलनाडु, पंजाब और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों की जलवायु में आसानी से उगाई जा सकती है। खासकर महाराष्ट्र जैसे राज्य, जहां अंगूर उत्पादन पहले से ही बड़े स्तर पर होता है, वहां यह किस्म किसानों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। आधुनिक और रोग-रोधी किस्मों को अपनाकर किसान कम समय में अधिक उत्पादन और बेहतर मुनाफा हासिल कर सकते हैं।





