पूसा बासमती 1886 धान की एक उन्नत और अधिक उपज देने वाली किस्म है, जिसे भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR-IARI), नई दिल्ली ने आधुनिक मार्कर-असिस्टेड सिलेक्शन (MAS) तकनीक के जरिए विकसित किया है। यह किस्म लोकप्रिय पूसा बासमती 6 का उन्नत रूप है, जिसमें बेहतर रोग प्रतिरोधक क्षमता के साथ-साथ बासमती चावल की उत्कृष्ट गुणवत्ता भी बरकरार रखी गई है। हरियाणा और उत्तराखंड के बासमती जीआई क्षेत्र के किसानों के लिए यह किस्म विशेष रूप से लाभकारी मानी जाती है।
रोगों से सुरक्षा देने वाली उन्नत किस्म
पूसा बासमती 1886 की सबसे बड़ी विशेषता इसकी दो प्रमुख रोगों — बैक्टीरियल ब्लाइट और ब्लास्ट — के प्रति मजबूत प्रतिरोधक क्षमता है। इस किस्म में बैक्टीरियल ब्लाइट से बचाव के लिए xa13 और Xa21 जीन मौजूद हैं, जबकि ब्लास्ट रोग से सुरक्षा के लिए Pi54 और Pi2 जीन शामिल किए गए हैं। इससे किसानों को फफूंदनाशक और अन्य रसायनों पर कम खर्च करना पड़ता है, जिससे खेती की लागत घटती है और फसल सुरक्षित रहती है।
कम समय में ज्यादा उत्पादन और प्रीमियम क्वालिटी, किसानों की पहली पसंद बनी पूसा बासमती HD-1692
बेहतर उत्पादन और मजबूत पौध संरचना
यह किस्म अर्ध-बौनी, गैर-लॉजिंग और गैर-बिखरने वाली है, जिससे फसल गिरने या दाने झड़ने की समस्या कम होती है। पूसा बासमती 1886 बीज से बीज तक लगभग 143 दिनों में तैयार हो जाती है। इसकी औसत उपज करीब 4.49 टन प्रति हेक्टेयर है और पौधे की ऊंचाई लगभग 95 सेंटीमीटर रहती है। उत्तरी भारत के सिंचित क्षेत्रों में इसकी खेती बेहतर परिणाम देती है। विशेषज्ञों के अनुसार इसकी नर्सरी 1 जून से 15 जून के बीच लगाना सबसे उपयुक्त माना जाता है।
दानों की गुणवत्ता और सुगंध में खास
पूसा बासमती 1886 अपने लंबे, पतले और आकर्षक दानों के लिए भी जानी जाती है। इसके कच्चे दानों की लंबाई लगभग 7.77 मिमी होती है, जो पकने के बाद बढ़कर 15.21 मिमी तक पहुंच जाती है। इसमें 23.71 प्रतिशत एमाइलोज सामग्री पाई जाती है, जिससे चावल की गुणवत्ता और पकने की क्षमता बेहतर होती है। इसके अलावा इसमें तेज़ प्राकृतिक सुगंध होती है और दानों में चाकपन नहीं होता, जिससे बाजार में इसकी मांग अधिक रहती है।
किसानों के लिए लाभदायक विकल्प
उच्च उपज, रोग प्रतिरोधक क्षमता और बेहतरीन दाना गुणवत्ता के कारण पूसा बासमती 1886 किसानों के लिए एक लाभकारी विकल्प बनकर उभरी है। यह किस्म न केवल उत्पादन बढ़ाने में मदद करती है, बल्कि रासायनिक दवाओं पर होने वाले खर्च को भी कम करती है। जो किसान बासमती धान की खेती से अधिक मुनाफा कमाना चाहते हैं, उनके लिए पूसा बासमती 1886 एक आधुनिक और भरोसेमंद विकल्प साबित हो सकती है।
खरीफ सीजन में किसानों को मिलेगा भरपूर डीजल, ट्रैक्टर और पंप चलाने में नहीं आएगी रुकावट।





