प्रिसिजन फार्मिंग (सटीक खेती) खेती का एक आधुनिक और स्मार्ट तरीका है, जिसमें डेटा और तकनीक की मदद से खेत के हर हिस्से को उसकी जरूरत के हिसाब से पानी, खाद और उर्वरक दिए जाते हैं। इसमें GPS, सेंसर, ड्रोन और डेटा एनालिटिक्स जैसी तकनीकों का इस्तेमाल होता है। इसका मुख्य उद्देश्य कम लागत में ज्यादा उत्पादन लेना और पर्यावरण को सुरक्षित रखना है। यह पारंपरिक अंदाज़े वाली खेती के बजाय वैज्ञानिक तरीके से काम करने पर जोर देती है, जिससे किसान कम संसाधनों में बेहतर मुनाफा कमा सकता है।
कैसे काम करती है प्रिसिजन फार्मिंग
इस तकनीक में अलग-अलग आधुनिक उपकरणों का उपयोग किया जाता है। सेंसर मिट्टी की नमी और पोषक तत्वों की जानकारी देते हैं, जबकि ड्रोन फसल की निगरानी करके बीमारी या नुकसान का पता लगाते हैं। GPS की मदद से ट्रैक्टर और मशीनें सही दिशा में काम करती हैं, जिससे खेत का कोई हिस्सा छूटता नहीं है। इसके अलावा स्मार्ट सिंचाई सिस्टम जरूरत के अनुसार अपने आप पानी देता है। इस तरह हर काम सटीक तरीके से होता है और संसाधनों की बर्बादी नहीं होती।
फायदे और कम लागत में शुरुआत कैसे करें
प्रिसिजन फार्मिंग अपनाने से खाद, बीज और पानी की बचत होती है, जिससे लागत कम हो जाती है। फसल को सही मात्रा में पोषण मिलने से पैदावार और गुणवत्ता दोनों बढ़ती हैं। साथ ही रसायनों का कम इस्तेमाल होने से जमीन और पानी भी सुरक्षित रहते हैं। किसान कम लागत में शुरुआत करने के लिए सॉयल हेल्थ कार्ड, लीफ कलर चार्ट (LCC), लेजर लैंड लेवलर (किराए पर), ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई, और मोबाइल ऐप्स का उपयोग कर सकते हैं। इसके अलावा 5-10 किसान मिलकर मशीनें किराए पर ले सकते हैं और कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) से ट्रेनिंग भी ले सकते हैं।
सरकार की सब्सिडी और लागत की जानकारी
भारत सरकार प्रिसिजन फार्मिंग को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाओं के तहत सब्सिडी देती है। ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई पर छोटे किसानों को 80% से 90% तक और बड़े किसानों को 45% से 50% तक सब्सिडी मिलती है। कृषि यंत्रों जैसे लेजर लेवलर पर 40% से 50% तक की छूट दी जाती है, जबकि किसान समूह (CHC) बनाने पर 80% तक सब्सिडी मिल सकती है। सोलर पंप के लिए PM-KUSUM योजना के तहत 60% सब्सिडी और 30% लोन मिलता है, जिससे किसान को केवल 10% खर्च करना पड़ता है। इस तरह कम निवेश में आधुनिक खेती शुरू करना आज पहले से कहीं ज्यादा आसान हो गया है।





