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हरी खाद से मिट्टी बनेगी पहले से ज्यादा उपजाऊ, जानिए किसानों के लिए इसके बड़े फायदे और उपयोग की पूरी जानकारी।

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हरी खाद ऐसी फसल को कहा जाता है जिसे हरा रहते हुए या पकने के तुरंत बाद मिट्टी में मिला दिया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य मिट्टी की गुणवत्ता और उर्वरता को बढ़ाना होता है ताकि अगली फसल को बेहतर पोषण मिल सके। हरी खाद के रूप में उपयोग किए जाने वाले पौधे मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ बढ़ाते हैं और उसे अधिक उपजाऊ बनाते हैं। यह प्राकृतिक खेती और टिकाऊ कृषि की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।

हरी खाद के प्रमुख उद्देश्य और लाभ

हरी खाद का उपयोग मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने, उसकी संरचना सुधारने और पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए किया जाता है। विशेष रूप से यह नाइट्रोजन की कमी को पूरा करने में मदद करती है। इसके अलावा हरी खाद मिट्टी के कटाव को रोकती है, जल धारण क्षमता बढ़ाती है और खेत की उत्पादकता में सुधार करती है। लगातार हरी खाद का उपयोग करने से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता भी कम हो सकती है।

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खेत में उगाई जाने वाली प्रमुख हरी खाद वाली फसलें

भारत में सनई, ढैंचा, नील, पिलिपेसारा और कुलथी जैसी फसलें हरी खाद के रूप में व्यापक रूप से उपयोग की जाती हैं। सनई तेजी से बढ़ने वाली फसल है जो अधिक मात्रा में जैविक पदार्थ और नाइट्रोजन उपलब्ध कराती है। ढैंचा भारी और क्षारीय मिट्टी को सुधारने में प्रभावी माना जाता है। वहीं नील सूखा सहन करने वाली फसल है, जबकि पिलिपेसारा और कुलथी कम उपजाऊ भूमि में भी अच्छी तरह उगाई जा सकती हैं। ये सभी फसलें मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

हरी पत्ती की खाद क्या है?

हरी पत्ती की खाद में पेड़ों और झाड़ियों की हरी पत्तियों तथा कोमल टहनियों को एकत्र करके खेत में मिलाया जाता है। इसके लिए ग्लिरिसिडिया, करंज और सेस्बानिया जैसी प्रजातियों का उपयोग किया जाता है। हरी पत्तियों की खाद का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे मिट्टी में सीधे जैविक पदार्थ जुड़ता है और कीट व रोग फैलने का खतरा भी कम रहता है। हालांकि पत्तियों को एकत्र करने और खेत तक पहुंचाने में अतिरिक्त श्रम और खर्च लग सकता है।

हरी खाद अपनाते समय ध्यान देने योग्य बातें

हरी खाद की फसल चुनते समय ऐसी प्रजातियों का चयन करना चाहिए जो कम समय में अधिक जैविक पदार्थ तैयार करें और वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिर करने की क्षमता रखती हों। हालांकि हरी खाद उगाने के लिए 2 से 3 महीने का अतिरिक्त समय, सिंचाई और कुछ लागत की आवश्यकता होती है। इसके बावजूद मिट्टी की सेहत सुधारने, उत्पादन बढ़ाने और खेती को अधिक टिकाऊ बनाने के लिए हरी खाद एक प्रभावी और लाभकारी विकल्प साबित हो रही है। यही कारण है कि आज अधिक से अधिक किसान प्राकृतिक और जैविक खेती में हरी खाद को अपनाने लगे हैं।

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