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किसानों के लिए जरूरी खबर! पहाड़ी राज्यों में खेती के लिए ICAR ने चुनीं ये खास सोयाबीन वैरायटी।

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देश के पहाड़ी राज्यों में खेती करने वाले किसानों के लिए अच्छी खबर सामने आई है। ICAR-National Soybean Research Institute यानी आईसीएआर-राष्ट्रीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान, इंदौर ने हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर के पर्वतीय क्षेत्रों के लिए सोयाबीन की कई उन्नत किस्मों की अनुशंसा की है। इन किस्मों को खासतौर पर पहाड़ी जलवायु और वहां की खेती की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर चुना गया है, ताकि किसानों को बेहतर उत्पादन और अच्छी गुणवत्ता की फसल मिल सके।

इन सोयाबीन किस्मों को दी गई अनुशंसा

संस्थान द्वारा उत्तरी पहाड़ी क्षेत्रों के लिए शालीमार सोयाबीन-3, NRC 197, VLS 99, हिम पालम सोया-1, Pant Soybean 25 और शालीमार सोयाबीन-1 जैसी किस्मों की सिफारिश की गई है। ये किस्में कम तापमान और पहाड़ी इलाकों की मिट्टी के अनुसार बेहतर प्रदर्शन करती हैं। साथ ही इनकी उपज क्षमता भी अच्छी मानी जाती है, जिससे किसानों की आमदनी बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

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हिमाचल और उत्तराखंड के किसानों को मिलेगा फायदा

विशेषज्ञों के अनुसार ये किस्में हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में खेती करने वाले किसानों के लिए काफी लाभकारी साबित हो सकती हैं। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर के कई हिस्सों में भी इन किस्मों की खेती सफल मानी जा रही है। इन उन्नत बीजों के इस्तेमाल से किसानों को मौसम की चुनौतियों के बीच भी बेहतर उत्पादन प्राप्त करने में सहायता मिल सकती है।

बीज चयन से पहले स्थानीय सलाह लेना जरूरी

कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी है कि वे बीज खरीदने या बुवाई करने से पहले अपने क्षेत्र के कृषि विज्ञान केंद्र या स्थानीय कृषि विभाग से जानकारी जरूर लें। स्थानीय मौसम, मिट्टी और वर्षा की स्थिति को ध्यान में रखकर सही किस्म का चयन करना अधिक फायदेमंद रहता है। सही बीज और वैज्ञानिक तरीके अपनाने से फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों बेहतर हो सकते हैं।

पहाड़ी खेती में सोयाबीन बन सकती है बेहतर विकल्प

सोयाबीन एक ऐसी फसल है जिसकी मांग लगातार बढ़ रही है। पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी खेती किसानों के लिए अतिरिक्त आय का अच्छा माध्यम बन सकती है। यदि किसान अनुशंसित किस्मों का चयन करें और समय पर खेती प्रबंधन अपनाएं, तो कम लागत में बेहतर उत्पादन हासिल किया जा सकता है। यही कारण है कि कृषि संस्थान अब अलग-अलग क्षेत्रों के अनुसार विशेष किस्मों की अनुशंसा कर रहे हैं, ताकि किसानों को खेती में अधिक लाभ मिल सके।

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