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तरबूज की खेती में सफलता का राज बनीं ये नई वैरायटी, कम लागत में मिलेगा ज्यादा उत्पादन।

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तरबूज गर्मी के मौसम की एक प्रमुख नकदी फसल है, जिसकी मांग हर साल तेजी से बढ़ती है। इसका मीठा स्वाद, अधिक पानी की मात्रा और पोषक गुण इसे बाजार में बेहद लोकप्रिय बनाते हैं। किसान कम समय में अच्छी कमाई के लिए अब उन्नत और हाई-यील्डिंग किस्मों की खेती की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। भारत में खुले परागण (OP), हाइब्रिड और बीजरहित (Seedless) तरबूज की कई किस्में उपलब्ध हैं। इनमें शुगर बेबी, आसाही यामाटो, किरण, माधुरी 64, जुबिली, क्रिमसन स्वीट और शुगर 75 जैसी किस्में अधिक उत्पादन और बेहतर गुणवत्ता के लिए पसंद की जाती हैं। सही किस्म का चयन बाजार मांग, फल के आकार, मिठास और उत्पादन क्षमता को ध्यान में रखकर करना चाहिए।

सही मौसम, मिट्टी और खेत की तैयारी से बढ़ता है उत्पादन

तरबूज की खेती के लिए 25 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान सबसे उपयुक्त माना जाता है। अत्यधिक ठंड और पाला इसकी फसल को नुकसान पहुंचा सकते हैं। अच्छी जल निकासी वाली बलुई दोमट मिट्टी, जिसका pH मान 6.0 से 7.5 के बीच हो, तरबूज उत्पादन के लिए बेहतर रहती है। खेत की तैयारी के दौरान 2 से 3 गहरी जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा बनाया जाता है। अंतिम जुताई में 20 से 25 टन प्रति हेक्टेयर अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है। जनवरी से मार्च के बीच बुवाई करना सबसे उपयुक्त माना जाता है। प्रति हेक्टेयर लगभग 2 से 3 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है और बुवाई से पहले बीजों को फफूंदनाशक से उपचारित करना चाहिए ताकि रोगों का खतरा कम हो सके।

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ड्रिप सिंचाई और फर्टिगेशन तकनीक से मिलता है बेहतर फायदा

उन्नत तरबूज खेती में ड्रिप सिंचाई और फर्टिगेशन तकनीक किसानों के लिए काफी लाभदायक साबित हो रही है। ड्रिप सिंचाई से 40 से 60 प्रतिशत तक पानी की बचत होती है और पौधों को लगातार नमी मिलती रहती है। वहीं मल्चिंग तकनीक अपनाने से मिट्टी की नमी बनी रहती है और खरपतवार नियंत्रण में मदद मिलती है। पौधों की दूरी लगभग 0.9 × 1.2 मीटर रखने से प्रति हेक्टेयर करीब 9200 पौधे लगाए जा सकते हैं। फसल की अच्छी वृद्धि के लिए नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का संतुलित उपयोग जरूरी होता है। फर्टिगेशन के माध्यम से 12 सप्ताह तक अलग-अलग चरणों में उर्वरक देने से पौधों को लगातार पोषण मिलता है और फल का आकार व गुणवत्ता बेहतर होती है।

सही प्रबंधन से 350 क्विंटल तक मिल सकता है उत्पादन

तरबूज की फसल में लाल कद्दू बीटल, एफिड्स और फल मक्खी जैसे कीटों का खतरा बना रहता है, जबकि डाउनी मिल्ड्यू और पाउडरी मिल्ड्यू प्रमुख रोग हैं। समय पर नियंत्रण उपाय अपनाने से फसल को नुकसान से बचाया जा सकता है। सामान्यतः तरबूज की फसल 75 से 90 दिनों में तैयार हो जाती है। यदि किसान उन्नत किस्मों का चयन, संतुलित पोषण, ड्रिप सिंचाई और उचित रोग-कीट प्रबंधन अपनाते हैं तो प्रति हेक्टेयर 250 से 300 क्विंटल तक उत्पादन आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। बेहतर तकनीक और वैज्ञानिक खेती अपनाने पर यह उत्पादन 350 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पहुंच सकता है, जिससे किसानों को अधिक मुनाफा मिल सकता है।

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