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खाद की कमी का खतरा बढ़ा: उर्वरक उत्पादन गिरने से किसानों की लागत और चिंता दोनों बढ़ीं।

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अंतरराष्ट्रीय हालात और सप्लाई चेन में आई रुकावटों का असर अब भारत के कृषि क्षेत्र पर साफ नजर आने लगा है। हाल ही में जारी रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2026 में देश में उर्वरक उत्पादन पिछले पांच साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। ऐसे समय में जब खेती का रकबा बढ़ रहा है, यह गिरावट किसानों के लिए चिंता का विषय बन गई है। यदि समय पर सुधार नहीं हुआ तो इसका सीधा असर फसल उत्पादन और किसानों की आय पर पड़ सकता है।

कोर सेक्टर में गिरावट की मुख्य वजह बना उर्वरक

कोर सेक्टर इंडेक्स में सालाना आधार पर 0.4% की गिरावट दर्ज की गई है, जो हाल के समय का कमजोर प्रदर्शन माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण उर्वरक उत्पादन में कमी है। अगर उर्वरक सेक्टर को इस आंकड़े से हटा दिया जाए, तो बाकी सेक्टर स्थिर दिखाई देते हैं। इससे साफ है कि मौजूदा स्थिति में उर्वरक क्षेत्र की भूमिका सबसे अहम रही है।

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उत्पादन घटने से सप्लाई और कीमतों पर असर

मार्च 2026 में उर्वरक उत्पादन में करीब 24–25% की गिरावट दर्ज की गई है, जिससे बाजार में सप्लाई प्रभावित हो सकती है। आने वाले समय में उर्वरकों की कमी और कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना है। इसका सीधा असर किसानों की लागत पर पड़ेगा, जिससे खेती महंगी हो सकती है। साथ ही कोयला, कच्चा तेल और बिजली जैसे अन्य सेक्टरों में भी गिरावट देखी गई है, जिसने इस स्थिति को और गंभीर बना दिया है।

आयात और गैस सप्लाई से सुधार की उम्मीद

भारत अपनी उर्वरक जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है, और अब घरेलू उत्पादन में कमी के कारण आयात पर निर्भरता और बढ़ सकती है। वहीं, उर्वरक उत्पादन में गिरावट की एक बड़ी वजह प्राकृतिक गैस की कमी भी रही है। अब गैस सप्लाई को बढ़ाकर लगभग 95% कर दिया गया है, जिससे आने वाले महीनों में उत्पादन में सुधार की उम्मीद जताई जा रही है।

जैविक खेती बन सकती है बेहतर विकल्प

बढ़ती लागत और उर्वरकों की कमी को देखते हुए अब जैविक खेती की ओर ध्यान बढ़ रहा है। यह न केवल किसानों की लागत कम कर सकती है, बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता को भी बेहतर बनाए रखती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान धीरे-धीरे जैविक खेती अपनाते हैं, तो वे लंबे समय में बेहतर और स्थायी लाभ प्राप्त कर सकते हैं। वर्तमान परिस्थितियों में यह खेती का एक समझदारी भरा विकल्प बनकर उभर रहा है।

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