देश में लगातार गेहूं और धान जैसी पारंपरिक फसलों की खेती से खेतों की उपजाऊ शक्ति धीरे-धीरे कम होती जा रही है। अधिक उत्पादन की चाह में किसान यूरिया और डीएपी का ज्यादा उपयोग कर रहे हैं, जिससे मिट्टी की सेहत खराब हो रही है और लागत भी बढ़ रही है। ऐसे में ढैंचा की खेती किसानों के लिए एक सस्ता और टिकाऊ विकल्प बनकर उभर रही है, जो प्राकृतिक खाद के रूप में काम करती है।
हरी खाद के लिए क्यों है ढैंचा सबसे बेहतर
ढैंचा को हरी खाद के रूप में सबसे प्रभावी फसलों में गिना जाता है। इसे फूल आने से पहले खेत में जोत दिया जाता है, जिससे यह मिट्टी में सड़कर प्राकृतिक खाद बन जाती है। इसकी खास बात यह है कि यह कम पानी में भी आसानी से उग जाती है और कमजोर जमीन में भी अच्छी बढ़वार देती है। ढैंचा मिट्टी में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश जैसे जरूरी पोषक तत्वों की पूर्ति करती है, साथ ही जमीन को भुरभुरी बनाकर उसमें हवा का संचार बेहतर करती है। इससे मिट्टी में जैविक पदार्थ यानी ह्यूमस की मात्रा भी बढ़ती है।
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कम लागत में आसान खेती का तरीका
ढैंचा की बुवाई का सबसे अच्छा समय अप्रैल से जुलाई के बीच माना जाता है। एक एकड़ खेत के लिए करीब 20 से 25 किलो बीज पर्याप्त होता है। बुवाई से पहले हल्की जुताई कर लें और मिट्टी में नमी बनाए रखें। अच्छे अंकुरण के लिए बीज को एक रात पहले पानी में भिगोना फायदेमंद रहता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे उगाने के लिए ज्यादा रासायनिक खाद की जरूरत नहीं होती। थोड़ी मात्रा में फास्फोरस देने से फसल अच्छी तरह बढ़ती है और घनी तैयार होती है, जिससे किसानों की लागत काफी कम हो जाती है।
50 दिन में तैयार होगी प्राकृतिक खाद
ढैंचा की फसल बहुत तेजी से बढ़ती है और लगभग 45 से 50 दिनों में तैयार हो जाती है। जब इसमें फूल आने लगें, तभी इसे खेत में जोत देना चाहिए। इसके बाद हल्की सिंचाई करने से पौधे जल्दी सड़कर मिट्टी में मिल जाते हैं और खाद का काम करते हैं। करीब 1500 रुपये प्रति एकड़ की लागत में तैयार यह प्राकृतिक खाद बाजार की महंगी खाद के बराबर मानी जाती है। इससे खेत को 35 से 40 किलो तक प्राकृतिक नाइट्रोजन मिलती है, जिससे अगली फसल में पैदावार बढ़ती है और लागत घटती है।
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