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kisan News : दूसरी फसलों के बजाय सरसों में मिलता है अधिक लाभ देखिए केसे

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दूसरी फसलों के बजाय सरसों में मिलता है अधिक लाभ  – 

kisan News : कृषि विभाग द्वारा रबी मौसम में सरसों फसल का रकबा एवं उत्पादन बढ़ाने हेतु विशेष अभियान चलाया जा रहा है। सरसों की फसल किसानों के लिए बहुत लोकप्रिय होती जा रही है, क्योंकि इसमें कम सिंचाई एवं लागत में दूसरी फसलों की अपेक्षा अधिक लाभ प्राप्त हो रहा है।

किस्म

संरक्षित तकनीकी के अंतर्गत, फसल चक्र अपनाना, जीरो टिलेज, सूक्ष्म सिंचाई, जरूरत के अनुसार भूमि का समतलीकरण, फसल अवशेष प्रबंधन को बढ़ावा आदि प्रक्रिया सम्मिलित है, इन सभी तकनीक के उपयोग से वातारण में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के साथ खाद्य सुरक्षा के लिए भी सरंक्षित खेती अपनानी चाहिए। जवाहर सरसों-2, जवाहर सरसों-3, राज विजय सरसों-2, नवगोल्ड, एनआरसीएचबी 101, आशीर्वाद, माया, पूसा  जय किसान आदि सरसों की उन्नतशील किस्मों को लगाकर 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

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जाने केसे करे बीज उपचार

सरसों की फसल को बीजजनित बीमारियों से बचाने के लिए बीज उपचार करना अति आवश्यक है। श्वेत कीट एवं मृदुरोमिल आसिता से बचाव हेतु मेटालेक्जिल (एप्रॉन एसडी-35) 6 ग्राम तथा तना गलन रोग से बचाव हेतु कार्बेन्डाजिम 3 ग्राम/कि.ग्रा. बीज के साथ उपचारित करें।

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sarso ki fasal

सरसों की फसल के लिए 8-10 टन गोबर की खाद या कम्पोस्ट खाद को बुवाई के कम से कम तीन से चार सप्ताह पूर्व खेत में अच्छी प्रकार से मिला दें। इसके पश्चात मिट्टी की जांच के अनुसार रसायनिक खाद का प्रयोग करें। सामान्यत: 60 किग्रा नाईट्रोजन, 40 किग्रा फास्फोरस, 30 किग्रा पोटाश एवं 20 किग्रा सल्फर प्रति हेक्टेयर के हिसाब से उर्वरकों का उपयोग करें।

सिंचाई की विधि

सरसों की बोवनी बिना पलेवा दिये की गई तो पहली सिंचाई 30-35 दिन पर करें। इसके पश्चात अगर मौसम शुष्क रहे तथा वर्षा नहीं हो तो ऐसी स्थिति में 60-70 दिन की अवस्था में जिस समय फली का विकास एवं फली  में दाना भर रहा हो तब करें।

बुवाई की विधि

सरसों की बुवाई मध्य अक्टूबर से मध्य नवम्बर में करना उचित है। बीज बुवाई के पूर्व मेटालेग्जिल (एप्रॉन 35 एस.डी.) 6 ग्राम प्रति कि.ग्रा. की दर से बीज उपचार करें। रोग के लक्षण दिखाई देने पर रिडोमिल (एमजेड 72 डब्ल्यूपी) अथवा मेंकोजेब 1250 ग्राम प्रति 500 लीटर पानी में घोलकर 10 दिन के अंतराल में प्रति हेक्टेयर की दर से छिडक़ाव करें। सामान्य सरसों का चेपा दिसम्बर में आता है एवं जनवरी-फरवरी में इसका प्रकोप ज्यादा दिखाई देता है। चेपा सामान्यत: उसकी विभिन्न अवस्था जैसे नवजात एवं वयस्क पौधों के विभिन्न भाग से मधुस्त्राव निकालते हैं, जिससे काले कवक का आक्रमण होता है और उपज कम होती है। प्रभावित शाखाओं को 2-3 बार तोडक़र नष्ट कर दें जिससे चेपा को रोका जा सकता है। नीम की खली का 5 प्रतिशत घोल का छिडक़ाव करें। कीट का अधिक प्रकोप होने की अवस्था में ऑक्सीडेमेटान मिथाइल 25 ईसी या डाइमिथिएट 30 ईसी की 500 उस मात्रा का 500 लीटर पानी में घोलकर छिडक़ाव करें।

सरसों लगभग 120-150 दिनों में पककर तैयार हो जाती है जैसे पौधे की पत्तियां एवं फलियों का रंग पीला पडऩे लगे उस अवस्था में कटाई कर लें। उपज मुख्य रूप से फसल प्रबंधन पर निर्भर करती है। यदि अनुशंसित विधि से सरसों की खेती की जाती है तो सामान्यत: सरसों- 20-25 क्विंटल/हेक्टेयर तथा रेपसीड- 14-20 क्विंटल/हेक्टेयर तक उपज प्राप्त होती है।

 
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