Gourd Farming: लौकी की उन्नत खेती करें, देखें लौकी में लगने वाले रोग और उपाय, अच्छी पैदावार के तरीके

लौकी की उन्नत खेती:हरी सब्जियों की बात हो और उसमें लौकी (louki) की बात ना हो ये मुमकिन ही नहीं। लौकी मानव शरीर के लिए बहुत लाभदायक है। इसे घिया और दूधी के नाम से भी जाना जाता है। लौकी की खेती (louki ki kheti) भारत में लगभग सभी राज्यों में की जाती है। लौकी में प्रचुर मात्रा में विटामन बी, सी, आयरन,मैग्नीशियम, पोटैशियम और सोडियम पाया जाता है। इसमें कई ऐसे गुण होते हैं, जो कुछ गंभीर बीमारियों में औषधि की तरह काम करते हैं। मधुमेह, वजन कम करने, पाचन क्रिया, कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने और नेचुरल ग्लो के लिए लौकी(louki) बहुत ही फायदेमंद है।

लौकी की खेती के लिए जलवायु

Gourd farming: लौकी की खेती (lauki ki kheti) के लिए गर्म और आर्द्र जलवायु की जरुरत होती है। बीज अंकुरण के लिए 30 से 35 डिग्री सेन्टीग्रेड और पौधों की बढ़वार के लिए 32 से 38 डिग्री सेन्टीग्रेड तापमान सबसे अच्छा होता है। उत्तरी भारत के बिहार, उत्तर प्रदेश, प्रदेश और हरियाणा राज्य के मैदानी इलाकों में लौकी की सबसे ज्यादा पैदावार होती है।

लौकी की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी

लौकी की खेती: लौकी की फसल के लिए बलुई दोमट और जीवांश युक्त चिकनी मिट्टी सबसे अच्छी होती है। जिसमें जल धारण क्षमता ज्यादा और पीएच की मात्रा 6.0 से 7.0 के बीच हो, वहां लौकी की खेती अच्छी होती है। ऐसे खेत जहां पानी निकासी की कोई व्यवस्था न हो, तो वहां इसकी खेती नहीं करें।

लौकी के खेत की जुताई का तरीका

Gourd farming: लौकी की खेती करने से पहले खेत की अच्छी तरह से जुताई कर लेनी चाहिए, जिससे खेत में की गयी पुरानी फसल के सारे अवशेष नष्ट हो जाये | इसके बाद खेत की गहरी जुताई कर देनी चाहिए गहरी जुताई के लिए पलाऊ या तवे वाले हलो का उपयोग करना चाहिए | इसके बाद खेत में रोटावेटर को चलवा कर मिट्टी में मौजूद मिट्टी के ढेलों को तोड़ उन्हें भुरभुरा और समतल बना दे | मिट्टी के समतल हो जाने के पश्चात् खेत में लौकी के पौधों को लगाने के लिए क्यारियों को तैयार कर ले।

लौकी की खेती: क्यारी धोरे नुमा तथा 10 से 15 फीट की दूरी पर बनाये, इसके अतिरिक्त बॉस की लकड़ियों का जाल बना कर भी इसकी खेती को किया जा सकता है। इसके बाद खेत में बनी क्यारियों में उचित मात्रा में गोबर की खाद और उवर्रक को डालकर अच्छे से मिला दे। इस प्रक्रिया को पौधों की रोपाई के लगभग 20 दिन पहले की जानी चाहिए।

लौकी की उन्नत किस्में

• कोयम्बटूर-1
• अर्का बहार पूसा समर प्रोलिफिक राउन्ड
• पंजाब गोल / कोमल
• पूसा संदेश
• कल्यानपुर लम्बी हरी
• आजाद हरित
• आजाद नूतन
• पूसा नवीन
• पूसा हाईब्रिड-3
• पुसा समर प्रोलेफिक लाग
• नरेंद्र रश्मि

लौकी की खेती में बीज बुवाई की मात्रा

लौकी की बुवाई के लिए प्रति हैक्टर 4-5 किलोग्राम लौकी बीज उपयुक्त होता है। बीज उपचार मे 2 ग्राम थीरम या बाविस्टीन से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचार करना है, उपचार करने का लाभ ये है कि इससे जमींन या भूमि से पैदा होने वाले रोग न लग सकें।

लौकी के पौधों को कैसे तैयार करे

यदि आप चाहे तो सीधे बीजो को खेत में लगाकर भी इसकी खेती कर सकते है । इसके लिए आपको तैयार की गयी नालियों में बीजो को लगाना होता है। जो की रोपाई से पहले तैयार की गयी नालियों में पानी छोड़ देना चाहिए उसके बाद उसमे बीज रोपाई करना चाहिए।लौकी की जल्दी और अधिक पैदावार के लिए इसके पौधों को नर्सरी में तैयार कर ले फिर सीधे खेत में लगा दे। पौधों को बुवाई के लगभग 20 से 25 दिन पहले तैयार कर लेना चाहिए। इसके अतिरिक्त बीज को रोग मुक्त करने के लिए बीज रोपाई से पहले उन्हें गोमूत्र या बाविस्टीन से उपचारित कर लेना चाहिए | इससे बीज में लगने वाले रोगो का खतरा कम हो जाता है, तथा पैदावार भी अधिक होती है।

लौकी की नर्सरी कैसे तैयार करें

आज देश का किसान इतना जागरूक हो चुका है की लगभग सभी प्रकार की सब्जियों की खेती करने से पहले उसकी नर्सरी तैयार करता है क्योंकि इसके फायदे काफी ज्यादा है| नर्सरी से तैयार पौधे मे लगभग सभी प्रकार के पौषक तत्व देकर एक अच्छा हाइब्रिड लौकी का बीज का पौधा तैयार कर सकते है।

लौकी की नर्सरी की तैयारी मे पहले किसान को अच्छी किस्म का बीज का चुनाव करना है । नर्सरी पौध तैयार करने के लिए छोटे पॉली बेग या प्लांट ट्रे का प्रयोग कर सकते है । मिट्टी की तैयारी के समय अच्छी जैविक खाद तथा जीवाश्म वाली मिट्टी को काम मे लेवे। छोटे पॉली बेग या प्लांट ट्रे मे मिट्टी को भरकर प्रत्येक बेग में एक-एक बीज हल्का गहरा लगा देना है ।बीज लगा देने के बाद छायादार और हल्की धूप आने वाले स्थान पर रखकर हल्का पानी दे जिससे बीज भीग जाए ।• इस प्रकार से तैयार की गई नर्सरी का पौधा 20-25 दिन मे 4-5 पत्तिया के साथ तैयार हो जाता है ।• नर्सरी के पौधे के 4 पत्तिया आने पर खेत मे लगा देना चाहिए ।

लौकी के पौधों में सिंचाई

लौकी के पौधों को अधिक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। यदि रोपाई बीज के रूप में की गयी है, तो बीज को अंकुरित होने तक नमी बनाये रखना होता है। यदि रोपाई पौधों के रूप में की गयी है, तो पौधे रोपाई के तुरंत बाद खेत में पानी लगा देना चाहिए। बारिश के मौसम में जरूरत पड़ने पर पौधों की सिंचाई करनी चाहिए। बारिश के मौसम के बाद इसकी सप्ताह में एक बार सिंचाई करते रहना चाहिए।अधिक गर्मियों के मौसम में इन्हे सिंचाई की अधिक आवश्यकता होती है, इसलिए इन्हे 3 से 4 दिन के अंतराल में पानी देते रहना चाहिए। जिससे पौधों में नमी बनी रहे, और जब पौधों पर फल बनने लगे तब हल्की-हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए जिससे फल अधिक मात्रा में प्राप्त हो सके।

लौकी के पौधों में उर्वरक की सही मात्रा

लौकी की खेती में सही उवर्रक के लिए खेत को तैयार करते समय प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 200 से 250 क्विंटल पुरानी गोबर की खाद को अच्छे से मिट्टी में मिला देना चाहिए, या फिर N. P.K के दो बोरे प्रति हेक्टेयर के हिसाब से खेत में डालने चाहिए। इसमें से एक बोरे को खेत में तैयार की गई नालियों में डालकर मिट्टी में अच्छे से मिला दे जबकि दूसरे बोरे को आधा आधा कर पौधों की सिंचाई के समय डालें। बीजो की रोपाई के लगभग 40 दिन बाद आधा बोरा तथा पौधों में फूल बनने के दौरान आधा बोरा पौधों में डालना चाहिए।

लौकी की फसल में लगने वाले रोग एवं उनकी रोकथाम के उपाय

सफ़ेद मक्खी रोग और रोकथाम

ये बहुत ही छोटे सफ़ेद कीट होते हैं। ये फसलों की कोमल पत्तियों के रस को चूसकर कमजोर बना देती है और विषाणु को भी फैलाती है।
सफ़ेद मक्खी से फसल को बचाने के लिए इमिडाक्लोरोपिड 1ML प्रति 15 लीटर पानी में घोल बनाकर स्प्रे करना चाहिए।

पत्ती खाने वाले कीड़े और रोकथाम

लौकी में फूल आने के समय हरे रंग के पत्ती खाने वाले कीड़ों का हमला देखने को मिलता है। दिन में पत्तियों के निचे छुपे रहते हैं और रात के अँधेरे में निकलकर कोमल पत्तियों को खाते हैं।इनसे लौकी की फसल को बचाने के लिए प्रोफेक्स सुपर 1.5 ml प्रति 15 लीटर पानी में घोल बनाकर स्प्रे करना चाहिए।

फल सड़न रोग और रोकथाम

अक्सर देखा जाता है की लौकी के छोटे फल सड़ने लगते हैं और बड़े फलों में काले रंग के दाग बन जाते हैं। जिससे उपज में काफी कमी हो जाती है।लौकी को सड़ने तथा दाग से बचाने के लिए मिराडोर 15 ml प्रति 15 लिटर पानी में घोल बनाकर 12 दिनों के अन्तराल पर स्प्रे करना चाहिए।

लौकी की खेती में खरपतवार नियंत्रण कैसे करे

लौकी के पौधों को उवर्रक की अधिक मात्रा दी जाती है, इसलिए इसके पौधों में खरपतवार नियंत्रण पर अधिक ध्यान देना चाहिए। क्योकि खरपतवार के हो जाने से इसके पौधों को उवर्रक की मात्रा अच्छे से नहीं मिल पाती है। लौकी के पौधों में खरपतवार पर नियंत्रण प्राकृतिक और रासायनिक दोनों ही तरीको से किया जा सकता है।प्राकृतिक तरीके से खरपतवार पर नियंत्रण करने के लिए पौधों की समय-समय पर निराई-गुड़ाई करते रहना चाहिए। रासायनिक तरीके से खरपतवार पर नियंत्रण के लिए ब्यूटाक्लोर का छिड़काव जमीन में बीज रोपाई से पहले तथा बीज रोपाई के तुरंत बाद करनी चाहिए।खरपतवार के नियंत्रण से पौधे अच्छे से वृद्धि करते है, तथा पैदावार भी अच्छी होती है।

साल में तीन बार कर सकते हैं लौकी की खेती

लौकी एक ऐसी कद्दू वर्गीय सब्जी हैं, जिसकी फसल को साल में तीन बार उगाया जाता हैं। जायद, खरीफ, रबी सीजन में लौकी की फसल ली जाती है। जायद की बुवाई मध्य जनवरी, खरीफ मध्य जून से प्रथम जुलाई तक और रबी सितंबर अंत से अक्टूबर के पहले सप्ताह तक लौकी की खेती की जाती है। जायद की अगेती बुवाई के लिए मध्य जनवरी में लौकी की नर्सरी डाली जाती है।

पूरक तत्वों से भरपूर है लौकी

आमतौर पर लोग लौकी को खाना बहुत ही कम पसंद करते हैं। ज्यादातर लोगों को खाने से बचते हुए देखा गया है। कुछ को स्वाद पसंद नहीं होता है, तो कुछ को ये पता नहीं होता है कि ये कितने फायदे वाली चीज हैं। अगर आपको भी ऐसा लगता है कि लौकी खाने से कोई फायदा नहीं है तो आपको बता दें कि ऐसा नहीं है। लौकी एक अत्यधिक लाभ वाली सब्ज़ी है, जिसके इस्तेमाल से आप कई तरह की बीमारियों से राहत पा सकते हैं। आपको बता दें कि लौकी में कई तरह के प्रोटीन, विटामिन और लवण पाए जाते हैं। इसमें विटामिन ए, विटामिन सी, कैल्शियम, आयरन, मैग्नीशियम पोटेशियम और विटामिन पाया जाता है। ये प्राथमिक तत्व शरीर की कई आवश्यकताओं की जांच करते हैं और शरीर को सुरक्षित सुरक्षित भी रखते हैं। इसके अलावा लौकी में कई ऐसे गुण होते हैं जो कुछ गंभीर नियमों में औषधि की तरह काम करते हैं।

जानिए लौकी (घीया) खाने से क्या-क्या फायदे होते हैं

• वजन कम करने में।
• नींद न आने की बीमारी को कम करता है।
• बालों का समय से पहले सफेद होने से रोकता है।
• स्ट्रेस कम करता है लौकी को खाने से स्ट्रेस कम होता है।
• हृदय को स्वस्थ रखने के लिए लौकी बेहद सुखद है।
• डाइजेशन में मदद करता है।
• त्वचा के लिए लाभदायक है।
• शरीर को ठंडा और हाइड्रेटेड रखता है।

क्यों गिर जाते हैं लौकी के फूल

लौकी के फूल गिरने के कई कारण होते हैं जैसे- अधिक सिंचाई, अधिक तापमान, कम तापमान, अनुकूल बीजों का न होना, पोषक तत्वों की कमी ऐसे कई सारे वजह होते हैं जिसके कारण लौकी के फूल गिरते हैं और इसका सीधा असर लौकी के उत्पादन पर पड़ता है। अतः किसानों को इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए लौकी के फूलों को गिरने से रोकने के लिए 10ml प्रति 15 लीटर पानी में शाइन तथा 15 ml प्रति 15 लिटर पानी में लूना फफुन्दनाशक का छिड़काव करना चाहिए।

लौकी की खेती कितने दिन में तैयार हो जाती है

लौकी बुआई करने के 55 से 60 दिन के बाद तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती हैं। लौकी के फलों की तुड़ाई 1 दिन के अन्तराल पर की जाती है। अगर लौकी के तुड़ाई के इस अंतराल को 1 से 2 दिन कर दिया जाय तो इनके फल बहुत बड़े, मोटे तथा कड़े हो जाते हैं। जिनकी मंडियों में कीमत आधे से भी कम हो जाती है। इसलिए लौकी की खेती में इसकी तुड़ाई का ख़ास ध्यान रखना चाहिए।

लौकी का उत्पादन

लौकी की फसल में पैदावार की बात करें, तो इसकी खेती कम खर्च में अच्छी पैदावार देने वाली खेती हैं। लौकी की खेती के लिए एक एकड़ में लगभग 15 से 20 हजार की लागत आती है और एक एकड़ में लगभग 70 से 90 क्विंटल लौकी का उत्पादन हो जाता है बाजारों में भाव अच्छा मिल जाने पर 80 हजार से एक लाख रुपए का शुद्ध आय होने की संभावना रहती है।