Onion Report: किसानों को कब तक रूलाएगा प्याज, प्याज में तेजी मंदी की वजह देखें, कब बढ़ेंगे भाव

दुनिया के कई देशों में प्याज की भारी किल्लत की वजह से इसके दाम आसमान छू रहे हैं। दुकानों से प्याज गायब हो चुके हैं। और इसकी राशनिंग तक हो रही है। वहीं दूसरी तरफ, भारत में इसकी थोक कीमतों में इतनी गिरावट आई कि किसानों को एक रुपये प्रति किलो प्याज बेचना पड़ रहा है। तो प्याज की कीमतों में ऐसी उतार-चढ़ाव की क्या वजह है? आने वाले वक्त में क्या भारत में भी इसके दाम बढ़ सकते हैं? इन सब सवालों के जवाब जानने के लिए बात करते हैं, आउटलुक के पूर्व संपादक और रूरल वॉयस के एडिटर इन चीफ हरवीर सिंह से जो आज हमारे साथ हैं :

हरवीर सिंह जी, यूरोपीय देशों से लेकर तुर्की, कजाकिस्तान, मरक्को और फिलिपींस तक में प्याज के दाम बेतहाशा बढ़ते जा रहे हैं। फिलिपींस में तो ये मीट से भी महंगा हो चुका है। तो इन सारे देशों में प्याज इतना महंगा क्यों हो गया?देखिए, एक तो वजह तो ये है कि कई सारे देश इम्पोर्ट पर काफी निर्भर हैं। और ये एक इस तरह की कोमोडिटी है, अगर आपकी आयात पर निर्भरता है और फ्रेश वेजिटेबल की तरह ट्रीट होता है। और आप जहां से आयात कर रहे हैं, अगर वहां क्राइसिस या प्रॉडक्शन में इश्यू आता है तो चैलेंजे आपके सामने खड़े होते हैं। ये इश्यू ज्यादातर यूरोपीय देशों में बड़े पैमाने पर उभर कर आए हैं।

क्या काफी हद तक लोकल फैक्टर्स भी जिम्मेदार हैं, जैसे अगर मौसम की बात करें तो हमने देखा कि फिलिपींस में पिछले साल कई तूफान आए थे, जिससे फसलों को भारी नुकसान पहुंचा। यूरोप के कई हिस्सों में भी सूखा पड़ा पिछले साल। पाकिस्तान और मोरक्को बाढ़ से जूझे। मौसम की मार और दूसरा रूस-यूक्रेन युद्ध, इन दोनों का मिला-जुला असर है जो ये हालत बनी?

काफी हद तक ये फैक्टर इसके लिए जिम्मेदार हैं। एक तो यूरोप के मौसम में काफी बदलाव आया है। एक तरह से वहां सूखे जैसी स्थिति वहां हुई, फ्रांस सहित कई देशों में। उसके चलते उत्पादन पर सीधे असर पड़ा। उसके चलते अंदाजा नहीं लगा पाए ये लोग। ये ऐसी फसल है जिसे बहुत लंबे समय तक आप स्टॉक नहीं कर पाएंगे, एक साल, दो साल। 5-6 महीने तक आप स्टोर कर सकते हैं, अगर अच्छी फसल है। उसके बाद आपको दिक्कत होगी। एक तो ये जो सूखा था और असामान्य मौसम रहा है, पूरे यूरोप में, इसने चीजों को खराब किया। और सेंट्रल एशिया में भी एक वजह रही। आप देखेंगे यूरोप में नदियां सूख गई थीं। खबरें हैं कि आल्प्स वगैरह में ग्लेशियर्स पिघल रहे हैं। क्योंकि वो बहुत ज्यादा गहरे नहीं होते। ये जो क्लाइमेट का असर है वो किस तरह से कृषि को प्रभावित कर सकता है और किस तरीके से उपभोक्ता को प्रभावित करेगा, उसका असर हम प्याज के भंडार और कीमतों में देख रहे हैं। खास तौर से यूरोपीय देशों में।

हालांकि यूएन और वर्ल्ड बैंक ने इसी महीने ये चेतावनी भी दी थी कि गाजर, टमाटर, आलू और सेब के साथ प्याज पर जो प्रतिबंध हैं, वो रेकॉर्ड स्तर तक पहुंच गए हैं। जिससे दुनिया भर में इसकी उपलब्धता मुश्किल हो रही है, लेकिन लगता है कि इसके बाद भी क्या इन देशों ने नहीं सुनी?

असल में, एग्रीकल्चर के जो पैटर्न होते हैं, उन्हें अचानक तो नहीं बदल सकते। और जिस तरीके से यूक्रेन और रूस के बीच में जो युद्ध शुरू हुआ, उसने एक तरीके से काफी सारे डिस्ट्रप्शन खड़े किए। जिससे सप्लाई प्रभावित हुई। ये इस तरीके की चीजें हैं कि भले यूएन और बाकी एजेंसी आपको सतर्क करे, लेकिन सवाल है कि आप क्या इतनी आसानी से सॉल्यूशन ढूंढ पाएंगे? अब एक और चैलेंज हो गया है कि ये देश जहां पर राशनिंग की स्थिति हो गई जो कल्पना से बाहर है। देखना पड़ेगा कि फूड ऐसी चीज हैं, जिसमें अगर आप पूरी तरीके से डिपेंडेंट रहेंगे तो आपके बीच संकट खड़ा हो सकता है और जरूरी नहीं है कि सप्लाई इतनी जल्दी दुरुस्त हो जाएं। और आप इस तरह की दिक्कत से बचें।

और अगर हमारे देश की बात करें तो यहां पर हालत यह है कि किसानों को लागत के अनुरूप कीमत ही नहीं मिल पा रही है। दो महीने में ही थोक कीमतें 1850 रुपये प्रति क्विंटल से घटकर 550 रुपये रह गई है। तो यहां दाम गिरने की क्या वजह है?

आपने सही कहा। हमने अभी चेक किया कि 400 रुपये से 600 रुपये के बीच में दाम चल रहे हैं। कुछ थोड़ी खराब क्वॉलिटी के प्याज की कीमत और नीचे आई है। खासतौर से जो प्रॉडक्शन एरियाज हैं आपका, महाराष्ट्र का नासिक है, सोलापुर है, सतारा है। इन सब जिलों में प्याज का ज्यादा उत्पादन होता है। एक फर्क ये भी है कि यह खरीफ की फसल है जिसके दाम अभी गिर रहे हैं। ये ऐसी फसल है जो ज्यादा लंबे समय तक नहीं टिक पाता है। मुख्य फसल रवी की होती है। खरीफ की कुल उत्पादन में हिस्सेदारी 15-20 फीसदी ही होती है। दूसरी यह है कि इस बार रवी का क्रेज अभी बढ़ा है।

पिछले साल 19 लाख 40 हजार हेक्टेयर था, जो अभी 21 लाख हेक्टेयर को पार कर चुका है। अब ये फसल आने वाली इस महीने के बाद रबी की। प्रॉडक्शन ज्यादा हुआ है खरीफ में। खरीफ की फसल को आप बहुत लंबे समय तक स्टोर नहीं कर सकते हैं। इसलिए जिन सेंट्रल एजेंसी NAFED को प्राइस रोकने का जिम्मा दिया जाता है । खासतौर से वो नामित एजेंसी है, वो भी अगर ज्यादा पार्टिशिपेट करेगी तो उनको भी इसे रखने और सही दाम पर बेचना मुश्किल होता है। इसलिए इंटरवेंशन कम होता है। हालांकि NAFED ने अभी शुरू किया है। पिछले दो-तीन दिन में कुछ खरीदा भी है 700-800 टन प्याज कुछ जगहों पर। लेकिन ये बहुत थोड़ी क्वांटिटी है और जब प्राइस क्रैश होता है, तो इस तरीके के ट्रेंड की तरह हो जाता है। ये एक बड़ी मुश्किल है प्याज उत्पादक किसानों के लिए क्योंकि अगर अभी भी बाजार में जाएंगे, तो मुझे तो नहीं लगता है कि 15 रुपये किलो से कम पर प्याज है जो कंज्यूमिंग एरियाज हैं।