लौकी की उन्नत वैज्ञानिक खेती कर किसानो की होगी लाखों की कमाई

लौकी की खेती : ज्वार, बाजरा, गेहूं, धान, जौ, आलू, चना, सरसों की अपेक्षा सब्जियों की खेती में कमाई ज्यादा है। लेकिन ये मुनाफा काफी कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि आप खेती किस तकनीकी से करते हैं। जहां पहले किसान धान, गेहूं और मोटे अनाजों की पैदावार को अपनी आय का एक मात्र जरिया मानते थे, वहीं वर्तमान समय में किसानों ने इस सोच से आगे बढक़र आलू, टमाटर, बैंगन, मिर्च, तोरई, कद्दू, खीरा आदि जैसी सह फसली खेती को कमाई का जरिया ही नहीं बनाया है बल्कि इनकी खेती से पूरे साल लाखों रुपये की कमाई भी कर रहे हैं। आज हम जिस सब्जी की खेती के बारे में बात कर रहे हैं। वह सभी कद्दूवर्गीय सब्जियों में एक महत्वपूर्ण सब्जी के रूप में जानी जाती हैं। इस सब्जी का नाम लौकी है। लौकी सब्जी को सभी कद्दू वर्गीय सब्जियों में प्रमुख माना जाता हैं। लौकी सामान्य तौर पर दो आकार की होती हैं, पहली गोल और दूसरी लंबी वाली, गोल वाली लौकी को पेठा तथा लंबी वाली लौकी को घीया के नाम से जाना जाता हैं। लौकी का इस्तेमाल सब्जी के अलावा रायता और हलवा जैसी चीजों को बनाने में भी किया जाता हैं। इसकी पत्तिया, तने व गूदे से अनेक प्रकार की औषधियां बनायी जाती है। पहले लौकी के सूखे खोल को शराब या स्प्रिट भरने के लिए उपयोग किया जाता था इसलिए इसे बोटल गार्ड के नाम से जाना जाता है। यह हर सीजन में मिलने वाली सब्जी हैं। इस सब्जी की मांग मंडी में हर समय काफी बड़े स्तर पर रहती है। किसान भाई इसकी खेती साल में तीन बार कर सकते हैं। लौकी की खेती से किसान भाई कम खर्च पर अधिक मुनाफा कमा सकते हैं। आज हम आपको ट्रैक्टर जंक्शन की इस पोस्ट में लौकी की खेती से संबंधित जानकारी जैसे- लौकी की खेती कैसे करें, लौकी की उन्नत किस्म एवं पैदावार की जानकारी देने जा रहे हैं। 

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जलवायु

लौकी की खेती के लिए गर्म एवं आर्द्र जलवायु की आवश्यकता होती है। इसकी बुआई गर्मी एवं वर्षा के समय में की जाती है। यह पाले को सहन करने में बिलकुल असमर्थ होती है। लौकी की अच्छी पैदावार के लिए गर्म एवं आर्द्रता वाले भौगोलिक क्षेत्र सर्वोत्तम होते हैं । अतः इसकी फसल जायद तथा खरीफ दोनों ऋतुओं में सफलतापूर्वक उगाई जाती है । बीज अंकुरण के लिए 30-35 डिग्री सेन्टीग्रेड और पौधों की वढ़वार के लिए 32-38 डिग्री सेन्टीग्रेड तापमान उत्तम होता है ।

लौकी की खेती के लिए भूमि का चयन व भूमि की तैयारी

बलुई दोमट तथा जीवांश युक्त चिकनी मिट्टी जिसमें जल धारण क्षमता अधिक हो तथा पी.एच.मान 6.0-7.0 हो लौकी की खेती के लिए उपयुक्त होती है । इसकी खेती विभिन्न प्रकार की भुमि में की जा सकती हैं किन्तु उचित जल धारण क्षमता वाली जीवांश्म युक्त हल्की दोमट भुमि इसकी सफल खेती के लिए सर्वोत्तम मानी गयी हैं। कुछ अम्लीय भुमि में भी इसकी खेती की जा सकती है। पथरीली या ऐसी भूमि जहां पानी लगता हो तथा जल निकास का अच्छा प्रबन्ध न हो इसकी खेती के लिए अच्छी नहीं होती है । खेत की तैयारी के लिए पपहली जुताई मिट्टी पलटने वाली हल से करें फिर 2‒3 बार हैरों या कल्टीवेयर चलाना चाहिए। प्रत्येक जुताई के बाद खेत में पाटा चलाकर मिट्टी को भुरभुरी एवं समतल कर लेना चाहिए जिससे खेत में सिंचाई करते समय पानी कम या ज्यादा न लगे ।

लौकी की खेती हेतु उन्नतशील किस्में – लौकी की उन्नत किस्में ( Bottle gourd Varieties )

कोयम्बटूर‐1 ‒

यह जून व दिसम्बर में बोने के लिए उपयुक्त किस्म है, इसकी उपज 280 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है जो लवणीय क्षारीय और सीमांत मृदाओं में उगाने के लिए उपयुक्त होती हैं।

अर्का बहार ‒

– यह खरीफ और जायद दोनों मौसम में उगाने के लिए उपयुक्त है। बीज बोने के 120 दिन बाद फल की तुडाई की जा सकती है। इसकी उपज 400 से 550 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त की जा सकती है।

पूसा समर प्रोलिफिक राउन्ड ‒

– यह अगेती किस्म है। इसकी बेलों का बढ़वार अधिक और फैलने वाली होती हैं। फल गोल मुलायम /कच्चा होने पर 15 से 18 सेमी. तक के घेरे वाले होतें हैं, जों हल्के हरें रंग के होतें है। बसंत और ग्रीष्म दोंनों ऋतुओं के लिए उपयुक्त हैं।

पंजाब गोल ‒

इस किस्म के पौधे घनी शाखाओं वाले होते है। और यह अधिक फल देने वाली किस्म है। फल गोल, कोमल, और चमकीलें होंते हैं। इसे बसंत कालीन मौसम में लगा सकतें हैं। इसकी उपज 175 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है।

पुसा समर प्रोलेफिक लाग ‒

– यह किस्म गर्मी और वर्षा दोनों ही मौसम में उगाने के लिए उपयुक्त रहती हैं। इसकी बेल की बढ़वार अच्छी होती हैं, इसमें फल अधिक संख्या में लगतें हैं। इसकी फल 40 से 45 सेंमी. लम्बें तथा 15 से 22 सेमी. घेरे वालें होते हैं, जो हल्के हरें रंग के होतें हैं। उपज 150 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है।

नरेंद्र रश्मि‒

– यह फैजाबाद में विकसित प्रजाती हैं। प्रति पौधा से औसतन 10‐12 फल प्राप्त होते है। फल बोतलनुमा और सकरी होती हैं, डन्ठल की तरफ गूदा सफेद औैर करीब 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती है।

पूसा संदेश‒

– इसके फलों का औसतन वजन 600 ग्राम होता है एवं दोनों ऋतुओं में बोई जाती हैं। 60‐65 दिनों में फल देना शुरू हो जाता हैं और 400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देती है।

पूसा हाईब्रिड‐3 ‒

– फल हरे लंबे एवं सीधे होते है। फल आकर्षक हरे रंग एवं एक किलो वजन के होते है। दोंनों ऋतुओं में इसकी फसल ली जा सकती है। यह संकर किस्म 475 क्ंवटल प्रति हेक्टेयर की उपज देती है। फल 60‐65 दिनों में निकलनें लगतें है।

पूसा नवीन‒

– यह संकर किस्म है, फल सुडोल आकर्षक हरे रंग के होते है एवं औसतन उपज 550‐600 क्ंवटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है, यह उपयोगी व्यवसायिक किस्म है।

पुसा समर प्रोलेफिक लाग ‒

यह किस्म गर्मी और वर्षा दोनों ही मौसम में उगाने के लिए उपयुक्त रहती हैं। इसकी बेल की बढ़वार अच्छी होती हैं, इसमें फल अधिक संख्या में लगतें हैं। इसकी फल 40 से 45 सेंमी. लम्बें तथा 15 से 22 सेमी. घेरे वालें होते हैं, जो हल्के हरें रंग के होतें हैं। उपज 150 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है।

नरेंद्र रश्मि‒

– यह फैजाबाद में विकसित प्रजाती हैं। प्रति पौधा से औसतन 10‐12 फल प्राप्त होते है। फल बोतलनुमा और सकरी होती हैं, डन्ठल की तरफ गूदा सफेद औैर करीब 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती है।

काशी गंगा –

– इस किस्म के पौधे मध्यम बढ़वार वाले तथा तनों पर गाँठे कम दूरी पर विकसित होती है । फल मध्यम लम्बा (30.0 सें.मी.) व फल व्यास कम (6.90 सें.मी.) होता है । प्रत्येक फल का औसत भार 800-900 ग्राम होता है । गर्मी के मौसम में 50 दिनों बाद एवं बरसात में 55 दिनों बाद फलों की प्रथम तुड़ाई की जा सकती है । इस प्रजाति की औसत उत्पादन क्षमता 435 कु./है. है ।

काशी बहार –

इस संकर प्रजाति में फल पौधें के प्रारंभिक गाँठों से बनने प्रारंभ होते हैं । फल हल्के हरे, सीधे, 30-32 सें.मी. लम्बे 780-850 ग्राम वनज वाले तथा 7.89 सें.मी. व्यास वाले होते हैं । इसकी औसत उपज 520 कु./है. है । गर्मी एवं बरसात दोनों ऋतुओं के लिए उपयुक्त किस्म है । यह प्रजाति नदियों के किनारे उगाने के लिए भी उपयुक्त है ।

पूसा नवीन –

– इस किस्म के फल बेलनाकार, सीधे तथा लगभग 550 ग्राम के होते हैं । इस प्रजाति की उत्पादन क्षमता 350-400 कु./है. है ।

नरेन्द्र रश्मि –

– फल हल्के हरे एवं छोटे-छोटे होते हैं । फलों का औसत बजन 1 कि.ग्रा. होता है । इस प्रजाति की औसत उपज 300 कु./है. है । पौधों पर चूर्णिल व मृदुरोमिल आसिता का प्रकोप कम होता है ।

पूसा संदेश –

– पौधे मध्यम लंबाई के तथा गाँठों पर शाखाएं कम दूरी पर विकसित होती हैं । फल गोलाकार, मध्यम आकार के व लगभग 600 ग्राम वनज के होते हैं । बरसात वाली फसल 55-60 दिनों व गर्मी वाली फसल 60-65 दिनों बाद फल की प्रथम तुड़ाई की जा सकती है । औसत उपज 320 कुन्टल प्रति हैक्टेयर होता है ।

बोने का समय –

ग्रीष्मकालीन फसल के लिए ‒ जनवरी से मार्च

वर्षाकालीन फसल के लिए ‒ जून से जुलाई

पंक्ति से पंक्ति की दूरी 1.5 मीटर ए पौधे से पौधे की दूरी 1.0 मीटर

बीज की मात्रा –

जनवरी से मार्च वाली फसल के लिए ‒ 4‐6 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर

जून से जुलाई वाली फसल के लिए ‒ 3‐4 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर

बीज की मात्रा –

जनवरी से मार्च वाली फसल के लिए ‒ 4‐6 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर

जून से जुलाई वाली फसल के लिए ‒ 3‐4 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर

लौकी की बुआई का सही तरीका –

लौकी की बुआई के लिए गर्मी के मौसम में 2.5-3.5 व वर्षा के मौसम में 4-4.5 मीटर की दूरी पर 50 से.मी. चैड़ी व 20-25 से.मी. गहरी नाली बना लेते हैं । इन नालियों के दोनों किनारे पर 60-75 से.मी. (गर्मी वाली फसल) व 80-85 से.मी. (वर्षा कालीन फसल) की दूरी पर बीज की बुआई करते हैं । एक स्थान पर 2-3 बीज 4 से.मी. की गहराई पर बोना चाहिए ।

खाद एवं उर्वरक –

मृदा की जाँच कराके खाद एवं उर्वरक डालना आर्थिक दृष्टि से उपयुक्त रहता है यदि मृदा की जांच ना हो सके तो उस स्थिति में प्रति हेक्टेयर की दर से खाद एवं उर्वरक डालें।

गोबर की खाद ‒ 20‐30 टन

नत्रजन ‒ 50 किलोग्राम

स्फुर ‒ 40 किलोग्राम

पोटाश ‒ 40 किलोग्राम

सिंचाई व जल प्रबंधन –

ग्रीष्मकालीन फसल के लिए 4‐5 दिन के अंतर सिंचाई की आवश्यकता होती है जबकि वर्षाकालीन फसल के लिए सिंचाई की आवश्यकता वर्षा न होने पर पडती है। जाड़े मे 10 से 15 दिन के अंतर पर सिंचाई करना चाहिए।

मल्चिंग और ड्रिप पद्धति से लाभ –

-जरूरत के अनुरूप पौधों को प्रतिदिन पानी मिलता है।
पानी को पूरे खेत में न भरकर केवल पौधों की जड़ के पास डाला जाता है।
-इस विधि से पानी की 70 प्रतिशत तक की बचत होती है।
-समय कम लगने से ईंधन अथवा बिजली की बचत होती है।
-उर्वरकों व रसायनों का प्रयोग वेंचुरी द्वारा पूरे खेत में न करके केवल पौधों के जड़ में किया जाता है।
-लगभग 30 प्रतिशत तक के उर्वरक की बचत होती है।
– इस पद्धति में खरपतवार न के बराबर होते हैं।
-पूरे खेत में पानी नहीं भराने से मिट्टी भुरभुरी व उपजाऊ बनी रहती है।
-फसल की जड़ों में हवा पहुंचती रहती है इससे गुड़ाई की जरूरत नहीं पड़ती है।
-पानी लगाने में, खाद देने में, निराई करने व गुड़ाई करने आदि में 50 प्रतिशत तक की मजदूरी लागत की बचत होती है।
– ड्रिप प्रणाली या टपका सिंचाई प्रणाली में सीधे पौधे की जड़ के पास ड्रिप लगाकर बूंद-बूंद कर पानी दिया जाता है। इससे फसलों की पैदावार बढऩे के साथ-साथ ड्रिप सिंचाई तकनीक विधि से रसायन एवं उर्वरकों का उपयोग करते हुए खरपतवारों में कमी आती है। इससे पानी की तो भारी बचत होती ही है साथ में लेबर व खाद में भी बचत होती है। इसमें बोरिंग से ही खाद बिना किसी लेबर के खेत के हर एक पेड़ को 15-20 मिनट में मिल जाती है। ड्रिप विधि की सिंचाई 80-90 प्रतिशत सफल होती है। अगर इसे बड़े पैमाने पर अपनाया जाए तो खासा पैसा कमाया जा सकता है। इस सिस्टम में खेत को प्लास्टिक बेंड़ों से ढक दिया जाता है, जिसे खेत में नमी बनी रहती है और पैरे खरपतवार नहीं पनप पाते। इन बेंडों के बीच में तयशुदा दूरी पर छेद कर पौधा को रोपा जाता है और रासायनिक, जैविक खादें भी दी जाती हैं। सिंचाई ड्रिप सिस्टम से ही की जाती है।

खरपतवार नियंत्रण एवं निकाई गुड़ाई –

छोनों ऋतु में सिंचाई के बाद खेत काफी मात्रा में खरपतवार उग आते हैं । अतः उनको खुर्पी की सहायता से 25-30 दिनों मेें निकाई करके खरपतवार निकाल देना चाहिए । लौकी में पौधे की अच्छी वृद्धि एवं विकास के लिए 2-3 बार निकाई-गुड़ाई करके जड़ों के पास मिट्टी चढ़ा देना चाहिए । रासायनिक खरपतवारनाशी के रूप में व्यूटाक्लोर रसायन की 2 कि.ग्रा. मात्रा प्रति हैक्टेयर की दर से बीज बुआई के तुरंत बाद छिड़काव करना चाहिए ।

लौकी के बेल को सहारा देना –

वर्षा ऋतु में लौकी गुणवत्ता अधिक उपज प्राप्त करने के लिए लकड़ी या लोहे द्वारा निर्मित मचान पर चढ़ा कर खेती करनी चाहिए । इससे फलों का आकार सीधा एवं रंग अच्छा रहता है तथा बढ़वार भी तेजी से होती है । प्रारम्भिक अवस्था में निकलने वाली कुछ शाखाओं को काटकर निकाल देना चाहिए इससे ऊपर विकसित होने वाली शाखाओं में फल ज्यादा बनते हैं । सामान्यतः मचान की ऊँचाई 5.0-5.5 फीट तक रखते हैं । इस पद्धति के उपयोग से सस्य क्रिया संबंधित लागत कम हो जाती है ।

निराई – गुडाई व खरपतवार प्रबंधन –

लौकी की फसल के साथ अनेक खरपतवार उग आते है। अत इनकी रोकथाम के लिए जनवरी से मार्च वाली फसल में 2 से 3 बार और जून से जुलाई वाली फसल में 3 – 4 बार निंदाई गुड़ाई करें।

लौकी के कीट एवं नियंत्रण –

कद्दू का लाल कीट (रेड पम्पकिन बिटिल) –

इस कीट का वयस्क चमकीली नारंगी रंग का होता है तथा सिर, वक्ष एवं उदर का निचला भाग काला होता है । सूण्ड़ी जमीन के अन्दर पाई जाती है । इसकी सूण्ड़ी व वयस्क दोनों क्षति पहुंचाते हैं । प्रौढ़ पौधों की छोटी पत्तियों पर ज्यादा क्षति पहुंचाते हैं । ग्रब (इल्ली) जमीन में रहती है जो पौधों की जड़ पर आक्रमण कर हानि पहुंचाती हैं । ये कीट जनवरी से मार्च के महीनों में सबसे अधिक सक्रिय होते हैं । अक्टूबर तक खेत में इनका प्रकोप रहता है । फसलों के बीज पत्र एवं 4-5 पत्ती अवस्था इन कीटों के आक्रमण के लिए सबसे अनुकूल है । प्रौढ़ कीट विशेषकर मुलायम पत्तियां अधिक पसंद करते हैं । अधिक आक्रमण होने से पौधे पत्ती रहित हो जाते हैं ।

नियंत्रण –

सुबह ओस पड़ने के समय रास का बुरकाव करने से भी प्रौढ़ पौधा पर नहीं बैठता जिससे नुकसान कम होता है । जैविक विधि से नियंत्रण के लिए अजादीरैक्टिन 300 पीपीएम / 5-10 मिली/लीटर या अजादीरैक्टिन 5 प्रतिशत / 0.5 मिली/लीटर की दर से दो या तीन छिड़काव करने से लाभ होता है । इस कीट का अधिक प्रकोप होने पर कीटनाशी जैसे डाईक्लोरोवास 76 ईसी. / 1.25 मिली/लीटर या ट्राईक्लोफेरान 50 ईसी. / 1 मिली/लीटर या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल./ 0.5 मिली/लीटर की दर से 10 दिनों के अन्तराल पर पर्णीय छिड़काव करें ।

फल मक्खी –

इस कीट की सूण्डी हानिकारक होती है । प्रौढ़ मक्खी गहरे भूरे रंग की होती है । इसके सिर पर काले तथा सफेद धब्बे पाये जाते हैं । प्रौढ़ मादा छोटे, मुलायम फलों के छिलके के अन्दर अण्डा देना पसन्द करती है, और अण्डे से ग्रब्स (सूड़ी) निकलकर फलों के अन्दर का भाग नष्ट कर देते हैं । कीट फल के जिन भाग पर अण्डा देती है वह भाग वहां से टेड़ा होकर सड़ जाता है । ग्रसित फल सड़ जाता है और नीचे गिर जाता है ।

नियंत्रण –

गर्मी की गहरी जुताई या पौधे के आस पास खुदाई करें ताकि मिट्टी की निचली परत खुल जाए जिससे फलमक्खी का प्यूपा धूप द्वारा नष्ट हो जाए तथा शिकारी पक्षियों को खाने के लिए खोल देता है । ग्रसित फलों को इकट्ठा करके नष्ट कर देना चाहिए । नर फल मक्खी को नष्ट करने लिए प्लास्टिक की बोतलों को इथेनाल, कीटनाशक (डाईक्लोरोवास या कार्बारिल या मैलाथियान), क्यूल्यूर को 6:1:2 के अनुपात के घोल में लकड़ी के टुकड़े को डुबाकर, 25 से 30 फंदा खेत में स्थापित कर देना चाहिए । कार्बारिल 50 डब्ल्यूपी./ 2 ग्राम/लीटर या मैलाथियान 50 ईसी / 2 मिली/लीटर पानी को लेकर 10 प्रतिशत शीरा अथवा गुड़ में मिलाकर जहरीले चारे को 250 जगहों पर 1 हैक्टेयर खेत में उपयोग करना चाहिए । प्रतिकर्षी 4 प्रतिशत नीम की खली का प्रयोग करें जिससे जहरीले चारे की ट्रैपिंग की क्षमता बढ़ जाए ।

आवश्यकतानुसार कीटनाशी जैसे क्लोरेंट्रानीप्रोल 18.5 एससी. / 0.25 मिली/लीटर या डाईक्लारोवास 76 ईसी. / 1.25 मिली/लीटर पानी की दर से भी छिड़काव कर सकते हैं ।

लौकी के रोग एवं नियंत्रण –

चूर्णील फफूंद

रोक का लक्षण पत्तियां और तनों की सतह पर सफेद या धुंधले धुसर दिखाई देती है । कुछ दिनों के बाद वे धब्बे चूर्ण युक्त हो जाते हैं । सफेद चूर्णी पदार्थ अंत में समूचे पौधे की सतह को ढंक लेता है । जो कि कालान्तर में इस रोग का कारण बन जाता है । इसके कारण फलों का आकार छोटा रह जाता है ।

नियंत्रण

इसकी रोकथाम के लिए रोग ग्रस्त पौधों को खेत में फफूंद नाशक दवा जैसे 0.005 प्रतिशत ट्राइडीमोर्फ अर्थात् 1/2 दवा 1 लीटर पानी में घोलकर सात दिन के अंतराल पर छिड़काव करें । इस दवा के उपलब्ध न होने पर फ्यूसिलाजोल 1 ग्राम/लीटर या हेक्साकानाजोल 1.5 मि.ली./लीटर या माईक्लोबूटानिल 1 ग्राम/10 लीटर पानी के साथ 7 से 10 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें ।

मृदुरोमिल फफूंदी

यह रोग वर्षा एवं गर्मीं वाली दोनों फसल में होते हैं। उत्तरी भारत में इस रोग का प्रकोप अधिक है । इस रोग के मुख्य लक्षण पत्तियों पर कोणीय धब्बे जो शिराओं पर सीमित होते हैं । ये कवक पत्ती के ऊपरी पृष्ठ पर पीले रंग के होते हैं तथा नीचे की तरफ रोयेदार फफूंद की वृद्धि होती है ।
नियंत्रण

बीजों को मेटलएक्सल नामक कवकनाशी की 3 ग्राम दवा प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित करके बोना चाहिए तथा मैकोंजेब 0.25 प्रतिशत पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए । छिड़काव रोग के लक्षण प्रारम्भ होने के तुरन्त बाद करना चाहिए । संक्रमण की उग्र दशा में साइमअक्सानिल $ मैंकोजेब 1.5 ग्रा./लीटर या मेटालैक्सिल $ मैंकोजेब 2.5 ग्रा./लीटर या मैटीरैम 2.5 ग्रा./लीटर पानी के साथ घोल बनाकर 7 से 10 दिन के अन्तराल पर 3-4 बार छिड़काव करें ।

विषाणु रोग

यह रोग विशेषकर नई पत्तियों में चितकबरापन और सिकुड़न के रूप में प्रकट होता है । पत्तियां छोटी एवं हरी-पीली हो जाती है । संक्रमित पौधे की वृद्धि रुक जाती है । इसके आक्रमण से पर्ण छोटे और पुष्प छोटे-छोटे पत्तियों जैसेें बदले हुए दिखाई पड़ते हैं । ग्रसित पौधा बौना रह जाता है और उसमें फलत बिल्कुल नहीं होता है ।

नियंत्रण –

बचाव के लिए ग्रस्त पौधों को उखाड़कर जला देना चाहिए । रोग वाहक कीटों से बचाव के करने के लिए इमिडाक्लोरोप्रिड 0.3 मिली/लीटर का घोल बनाकर दस दिन के अन्तराल में 2-3 बार फसल पर छिड़काव करें ।

लौकी की खेती में लगने वाले कीटों की रोकथाम

लाल कीडा (रेड पम्पकिन बीटल)

प्रौढ कीट लाल रंग का होता है। इल्ली हल्के पीले रंग की होती है तथा सिर भूरे रेग का होता है। इस कीट की दूसरी जाति का प्रौढ़ काले रंग का होता है। पौधो पर दो पत्तियां निकलने पर इस कीट का प्रकोप शुरू हो जाता है।यह कीट पत्तियों एवं फुलों कों खाता हैए इस कीट की सूंडी भूमि के अंदर पौधो की जडों को काटता है।

रोकथाम ‒

– निंदाई गुडाई कर खेत को साफ रखना चाहिए।
– फसल कटाई के बाद खेतों की गहरी जुताई करना चाहिएए जिससे जमीन में छिपे हुए कीट तथा अण्डे ऊपर आकर सूर्य की गर्मी या चिडियों द्वारा नष्ट हो जायें।
– सुबह के समय कीट निष्क्रिय रहतें है। अतः खेंतो में इस समय कीटों को हाथ/जाल से पकडकर नष्ट कर दें।
– कार्बोफ्यूरान 3 प्रतिशत दानेदार 7 किलो प्रति हेक्टेयर के हिसाब के पौधे के आधार के पास 3 से 4 सेमी. मिट्टी के अंदर उपयोग करें तथा दानेदार कीटनाशक डालने के बाद पानी लगायें।
– प्रौढ कीटों की संख्या अधिक होने पर डायेक्लोरवास 76 ई.सी. 300 मि.ली. प्रति हेक्टेयर की दर से छिडकाव करें

फलों की तुड़ाई एवं उपज

लौकी के फलों की तुड़ाई मुलायम अवस्था में करना चाहिए । फलों का वनज किस्मों पर निर्भर करता है । फलों की तुड़ाई डण्ठल लगी अवस्था में किसी तेज चाकू से करना चाहिए एवं चार से पाँच दिन के अंतराल पर करना चाहिए ताकि पौधे पर ज्यादा फल लगें । औसतन लौकी की उपज 350-500 कुन्टल/हैक्टेयर होती है ।