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काली हल्दी की करे खेती और करे अपनी कमाई को दोगुना देखे सही तरीका

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Haldi Ki Kheti: काली हल्दी Black Turmeric का पौधा दिखने में केले के समान होता है काली हल्दी या नरकचूर याक औषधीय महत्व का पौधा है | जो कि बंगाल में वृहद् रूप से उगाया जाता है | इसका उपयोग रोग नाशक व सौंदर्य प्रसाधन दोनों  रूपों में किया जाता है |

वानस्पतिक नाम curcuma cacia व अंग्रेजी में ब्लेक जे डोरी भी कहते हैं  | यह जिन्नी विरेसी कुल का सदस्य है , इसका पौधा तना रहित 30 – 60 से.मी. ऊँचा होता है | पत्तियां चौड़ी गोलाकार उपरी स्थल  पर नील बैंगनी रंग की मध्य शिरा युक्त होती है | पुष्प गुलाबी किनारे की ओर रंग के शपत्र लिए होते हैं | राइजोम बेलनाकार गहरे रंग के सूखने पर कठोर किस्टल बनाते हैं | राइजोम का रंग कालिमा युक्त होता है

काली हल्दी उपयुक्त जलवायु :-

इसकी खेती के लिए उपयुक्त जलवायु उष्ण होती है | तापमान 15 से 40 डिग्री सेन्टीग्रेट होना चाहिए |

काली हल्दी हेतु भूमि की तैयारी :-

 दोमट, बलुई, मटियार प्रकार की भूमि में अच्छे से उगाई जा सकती है | वर्षा के पूर्व जून के प्रथम सप्ताह में 2 – 4 बार जुताई करके मिट्टी  भुरभुरी बना लें तथा जल निकासी की व्यवस्था करलें | खेत में 20 टन प्रति हे. की दर से गोबर की खाद मिला लें |

काली हल्दी बोने का समय व विधि :-

बोने के लिए पुराने राइजोम को जिन्हें ग्रीष्म काल में नमीयुक्त स्थान पर तेल में दवा कर संग्रह किया गया है को उपयोग में लाते हैं | इन्हें नये अंकुरण आने पर छोटे – छोटे टुकड़ों में काट लिया जाता है  | जिन्हें तैयार की गई भूमि में 30 से.मी. कतार से कतार 20 से.मी. पौधे से पौधे के अंतराल पर 5 से 10 से.मो. गहराई पर बोया जाता है  | एक हेक्टेयर के लिए 15 से 20 किवंटल कलि हल्दी की बीज की जरुरत होरी है |

खरपतवार की नियंत्रण के लिए 2 से 3 बार निंदाई हाथ से ही करनी होती है | जिससे पौधे को मिलने वाली पोषक तत्व की कोई कमी नहीं होती है |

काली हल्दी में सिंचाई

इसके लिए  ज्यादा सिंचाई की जरुरत नहीं होती है | इसके लिए बरसात की वर्षा काफी है | लेकिन हल्दी की खेती लम्बी अवधि की होने के कारण बरसात बाद 2 सिंचाई की जरुरत पड़ती है |

रोग व कीट :-

इसकी फसल पर पर किसी भी तरह का कोई रोग तथा कीट का प्रकोप नहीं होता है |

काली हल्दी की खुदाई कैसे करें 

फसल अवधि 8 माह में तैयार होती है | प्रक्न्दों को सावधानिपुर्वक बिना क्षति पहुंचाए खोद कर निकाल व साफ करके छ्यादर सूखे स्थान पर सुखायें | अच्छी किस्म के राइजोम को 2 – 4 से.मी. के टुकड़ों में काटकर सुखा कर रखें जो सुख कर कठोर हो जाते है |

काली हल्दी उत्पादन

ताजे कंदों का उत्पादन 250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होता है | जबकि उसे सुखाने के बाद 50 क्विंटल प्रति हेक्टयर तक प्राप्त होता है |

काली हल्दी के उपयोग 

पिली हल्दी से ज्यादा फायदेमंद और गुणकारी मन जाता है | इसमें अद्भुत शक्ति होती है | कलि हल्दी भुत दुर्लभ मात्रा में पाई जाती और देखि जाती है | कलि हल्दी दिखने में अन्दर से हल्के काले रंग की होती है और उसका पौधा केलि के समान होता है | तंत्र शास्त्र में कलि हल्दी को प्रयोग करने से पहले उसको सिद्ध किया जाता है | काली हल्दी को सिद्ध करने के लिए होली का दिन भुत ही लाभकारी मन जाता है | कलि हल्दी में वशीकरण की अद्भुत क्षमता होती है |

काली हल्दी का प्रयोग

आदिवासी समाज इसका प्रयोग निमोनिया, खांसी और ठंड के उपचार के लिए जाता है | बच्चों एवं वयस्कों में बुखार और अस्थमा के लिए इसका उपयोग किया जाता है | इसके राइजोम का पाउडर फेस पेक के रूप में किया जाता है | इसके ताजे राइजोम को पीसकर माथे पर pest के रूप में लगाते हैं , जो माइग्रेन से राहत के लिए या मस्तिक और घों के लिए लगाया जाता है | सांप और बिच्छु को काटने पर इसके राइजोम का पेस्ट लगाया जाता है |  ल्युक्द्र्मा, मिर्गी, कैंसर और एच आई वी एड्स की रोकथाम में भी उपयोग किया जाता है |

काली हल्दी को एंटी बायोटिक गुणों के साथ जड़ी बूटी के रूप में मान्यता प्राप्त है | काली हल्दी का तिलक लगाया जाता है एवं ताबीज के रूप में भी उपयोग किया जाता है | ऐसी मान्यता है कि यह सभी प्रकार के काले जादू को निकाल देगी | इसका उपयोग घाव, चोट और मोच त्वचा की समस्या एवं पाचन एवं पाचन की समस्या के लिए इसका उपयोग किया जाता है | मन जाता है की यह कैंसर को रोकने और इलाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है | इसमें सुगन्धित वाश्पिशील तेल होता है जो सुजन को कम करने में मदद करती है | यह कोलेस्टोल को कम करने में मदद करती है

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